15. कौन निर्णय कर सकता है - Page 421

412 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

और सेवाओं में 50 प्रतिशत भागीदारी, तो कौन-सा विकल्प अधिक श्रेष्ठ

है?

(5) यदि भारत अखंड रहता है, तो क्या वह इस बात पर भरोसा

कर सकता है कि हिंदू और मुसलमान दोनों अपनी स्वतंत्रता की रक्षा कर

सकेंगे, यह मानते हुए कि यह स्वतंत्रता बर्तानिया से जीती गई है?

(6) हिंदू और मुसलमानों के बीच चल रहे विरोध और उन्हें दो

विभिन्न राष्ट्रों में विभाजित करने की नई विचारधारा के संदर्भ में, क्या इन

दोनों राष्ट्रों के लिए एकमात्र ऐसा संविधान बनाया जा सकता है, जिसके

फलस्वरूप यह आशा की जा सके कि वे दोनों उसे कार्यान्वित करने की

इच्छा प्रकट करेंगे और उसमें कोई गत्यावरोध उत्पन्न नहीं करेंगे?

(7) इस कल्पना पर कि दो राष्ट्र का सिद्धांत स्थायी हो गया है,

क्या भारत भौतिक एकता के अभाव में एक इकाई के रूप में असंगत नहीं

हो जाएगा तथा सामान्य नियति और सामान्य विश्वास में बंधा यह देश

एक शक्तिसम्पन्न और एकताबद्ध राष्ट्र के रूप में अपना विकास करने के

अयोग्य नहीं हो जाएगा, जिसके फलस्वरूप यह देश निर्बल और रोगग्रस्त

होकर आसानी से बर्तानिया अथवा अन्य किसी दूसरी बाहरी शक्ति के

सतत अधीन हो जायेगा?

(8) यदि भारत एक संयुक्त देश नहीं हो सकता, तो क्या यह

अधिक अच्छा नहीं होगा कि भारतीय जन इस बेमेल अखंड भारत को

पाकिस्तान और भारत रूपी दो प्राकृतिक भागों में शांति से विभाजित करने

में मदद करें?

(9) इस झूठी आशा से कि हिंदू और मुसलमान किसी दिन एक

हो जाएंगे और इस देश के सदस्यों तथा भारत माता के सपूतों की तरह

यहां रहेंगे, भारत को एक अविभाजित देश के रूप में रखने के व्यर्थ प्रयास

की अपेक्षा क्या यह अधिक अच्छा नहीं होगा कि मुसलमानों के लिए

पाकिस्तान और हिंदुओं के लिए हिंदुस्तान- दो स्वतंत्र और पृथक राष्ट्र बना

दिए जाएं?

निम्नोक्त तीन बातों- (1) ऐतिहासिक देश-पे्रम की मिथ्या भावना, (2) प्रदेश के अनन्य स्वामित्व की मिथ्या धारणा और (3) स्वयं के विषय में सोचने की इच्छा का अभाव - के अलावा पूर्वगामी पृष्ठों में सन्निहित सामग्री की सहायता से भारतीयों को इन मुद्दों पर दृढ़तापूर्वक सोचने और अपने निष्कर्षों पर पहुंचने के मार्ग में कोई बाधा उपस्थित नहीं हो सकती। उक्त तीन बाधाओं में अंतिम पर पार पाना बहुत