15. कौन निर्णय कर सकता है - Page 422

उपसंहार 413

कठिन है। दुर्भाग्यवश भारत में चिंतन की बहुत कमी है और स्वतंत्र चिंतन तो और भी कम है। यह बात विशेषतः हिंदुओं के बारे में है। इसीलिए प्रस्तुत पुस्तक के तर्क का एक बड़ा भाग उन्हीं को संबोधित किया गया है। इसके कारण स्पष्ट हैं। हिंदू बहुसंख्या में हैं। बहुसंख्या में होने के फलस्वरूप उनके दृष्टिकोण को स्थान मिलना चाहिए। यदि उनकी औचित्यपूर्ण अथवा भावात्मक आपत्तियों के निवारणार्थ कोई प्रयत्न नहीं किया गया, तो शांतिपूर्ण समाधान की अधिक संभावना नहीं है। लेकिन इसके कुछ विशेष कारण हैं, जिसके फलस्वरूप बहस के एक बड़े भाग को उन्हें संबोधित करने के लिए मुझे अग्रसर होना पड़ा है जो शायद दूसरों को स्पष्ट न हो। मैं यह अनुभव करता हूं कि वे हिंदू जो अपने साथियों के भाग्य का मार्गदर्शन करते हैं, श्री कार्ले के कथनानुसार ‘दर्शन चक्षु’ खो चुके हैं और व्यर्थ के जादुई मायालोक में विचरण कर रहे हैं, जिसका परिणाम, मुझे डर है, हिंदुओं के लिए भयानक होगा। हिंदू कांगे्रस की पकड़ में हैं और कांगे्रस श्री गांधी की पकड़ में। यह नहीं कहा जा सकता कि गांधीजी ने कांगे्रस को सही नेतृत्व प्रदान किया है। श्री गांधी ने पहले तो दो बातों के बहाने विभाजन विषयक प्रश्न को टालने का प्रयास किया। उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि भारत का विभाजन एक नैतिक भूल है और एक पाप है, जिसके भागीदार वह नहीं होंगे। यह एक आश्चर्यजनक तर्क है। भारत ही अकेला ऐसा देश नहीं है, जिसे राष्ट्रीय तथ्यों पर अवलंबित कारणों से प्राकृतिक और ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित सीमाओं के स्थानांतरण संबंधी समस्या अथवा विभाजन का सामना करना पड़ा हो। पोलैंड का तीन बार विभाजन हुआ और कोई भी यह विश्वास से नहीं कह सकता कि उसका अब आगे विभाजन नहीं होगा। यूरोप में ऐसे बहुत कम देश हैं, जिनका गत 150 वर्षों की अवधि में विभाजन न हुआ हो। यह तथ्य इस बात को प्रदर्शित करता है कि देश का विभाजन न नैतिक है और न अनैतिक। यह एक सामाजिक, राजनीतिक अथवा फौजी प्रश्न है। इसमें पाप का कोई स्थान नहीं है।

दूसरे प्रश्न के संदर्भ में, श्री गांधी ने विरोधस्वरूप कहना शुरू कर दिया है कि मुस्लिम लीग मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करती और पाकिस्तान सिर्फ श्री जिन्ना की कल्पना है। यह समझना बेहद कठिन है कि गांधीजी इतना भी अपनी आंखों से नही देख सके कि किस तरह मुस्लिम जनता पर श्री जिन्ना का प्रभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है और किस प्रकार वह अपनी पूरी ताकत को एकत्रित करने में व्यस्त हैं। इसके पूर्व श्री जिन्ना जनता के आदमी नहीं थे। वे जनता पर अविश्वास करते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में कहा है कि जिन्ना कांगे्रस