15. कौन निर्णय कर सकता है - Page 423

414 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

की सदस्यता मैट्रिक पास लोगों तक ही सीमित करना चाहते थे। आम जनता को राजनीतिक शक्ति से बाहर रखने के लिए वे सदा उच्च मताधिकार के पक्ष में रहे। श्री जिन्ना कभी भी एक पक्के, निष्ठावान तथा अनुरक्त मुस्लिम नहीं थे। विधानसभा की सदस्यता के लिए शपथ ग्रहण करते हुए पवित्र कुरान को चूमने के अलावा ऐसा लगता है कि उन्होंने कभी उसकी विषय-वस्तु अथवा विशिष्ट अभिप्रायों को समझने का झंझट मोल लेने का कष्ट नहीं किया। यह संदेहास्पद है कि वे कभी किसी मस्जिद में गए हों या धार्मिक अथवा राजनीतिक मजलिस में मुस्लिम जनता के बीच उन्हें देखा गया हो। आज श्री जिन्ना में पूर्ण परिवर्तन पाया जाता है। आजकल वे जनता के आदमी हैं। जनता से ऊपर नहीं हैं। वे उनके साथ हैं। अब जनता ने उन्हें अपने से ऊपर उठा दिया है और उन्हें कायदे-आजम नाम से पुकारती है। अब वे इस्लाम धर्म के प्रति मात्र श्रद्धालु ही नहीं, अपितु उसके लिए अपनी जान देने को तैयार हैं। मात्र ‘कलमा’ की अपेक्षा आज वे इस्लाम के बारे में अधिक समझते हैं। आज वे

खुतबा सुनने और ईद की नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद में जाते हुए प्रसन्न होते हैं। डोंगरी और नुलबाज़ार एक समय श्री जिन्ना को उनके नाम से जानते थे। अब वे उन्हें उनकी उपस्थिति से जानते हैं। बंबई में कोई भी मुस्लिम सभा अल्ला-हो-अकबर तथा कायदे-आजम जिंदाबाद के नारों के बिना प्रारंभ अथवा समाप्त नहीं होती। इस मामले में उन्होंने फ्रांस के किंग हेनरी का अनुसरण किया है, जो कि इंगलिश किंग चार्ल्स- I के ससुर थे। हेनरी- I हनोट धर्म के अनुयायी थे, परंतु पेरिस में वे कैथोलिक चर्च में जनता के बीच जाने में भी नहीं हिचकिचाते थे। उनका विश्वास था कि पेरिस का शक्तिशाली समर्थन पाने के लिए अपने विश्वास को बदलकर हनोट चर्च में जनता के बीच जाना सस्ता सौदा है। जिस प्रकार हेनरी-4 के लिए पे्ररिस जनता का प्रतीक था, इसी प्रकार श्री जिन्ना के लिए डोंगरी और नलबाजार जनता का प्रतीक बन गया है। यह एक रण-कौशल है, लामबंदी है। परंतु यदि इसे श्री जिन्ना की विवेकपूर्ण स्थिति से अंधविश्वास की प्रवृत्ति की ओर जाना कहा जाए, तो वे अपने आदर्श से नीचे गिर रहे हैं, और मुस्लिम समाज के विभिन्न स्तरों पर भी इसका प्रसार करते हुए इस मनोवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं। यह इतना स्पष्ट है, जितनी कि कोई चीज हो सकती है। श्री गांधी के असाधारण दृष्टिकोण का एक मात्र आधार राष्ट्रवादी मुसलमान हैं। लीग को बनाने वाले सांप्रदायिक मुसलमानों और राष्ट्रवादी मुसलमानों के अंतर को समझना कठिन है। यह अत्यंत संदिग्ध है कि राष्ट्रवादी मुसलमान किसी वास्तविक जातीय भावना, लक्ष्य तथा नीति से कांगे्रस के साथ रहते हैं, जिसके फलस्वरूप वे मुस्लिम लीग से पृथक पहचाने जाते हैं। यह कहा जाता है कि वास्तव में अधिकांश कांगे्रसजनों की धारणा है कि इन दोनों में कोई अंतर नहीं है और कांगे्रस के अंदर राष्ट्रवादी मुसलमानों की स्थिति सांप्रदायिक मुसलमानों की सेना की एक चौकी की