15. कौन निर्णय कर सकता है - Page 424

उपसंहार

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तरह है। यह धारणा असत्य प्रतीत नहीं होती। जब कोई व्यक्ति इस बात को याद करता है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के नेता स्वर्गीय डॉ. अंसारी ने सांप्रदायिक निर्णय का विरोध करने से इन्कार किया था, यद्यपि कांगे्रस और राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा पारित प्रस्ताव का घोर विरोध होने पर भी मुसलमानों को पृथक निर्वाचन उपलब्ध हुआ। इतना ही नहीं, मुसलमानों में लीग के प्रभाव की वृद्धि इतनी तीव्र रही कि अनेक मुसलमान, जो लीग के विरोधी थे, लीग में सम्मिलित होने और उससे संधि करने के निमित्त अपना स्थान ढूंढने के लिए मजबूर हो गए। बंगाल के भूतपूर्व प्रधान मंत्री श्री फजलुल हक और स्वर्गीय सर सिकंदर हैयात खां के विचारों के बदलाव पर नजर डालने से उक्त तथ्य की सचाई सामने आ जाती है। 1937 में जब श्री जिन्ना ने लीग का जीर्णोद्वार करने का प्रयास किया था, सर सिकंदर और श्री फिजलुल हक दोनों ने अपने-अपने प्रांतों में मुस्लिम लीग की शाखाओं के गठन का विरोध किया था। लेकिन उक्त विरोध के बावजूद जब दो वर्ष की अवधि में पंजाब और बंगाल में मुस्लिम लीग की शाखाओं का गठन हुआ, तो दोनों उसमें सम्मिलित होने के लिए विवश हो गए। यह मामला उन लोगों का है, जो आये थे आक्षेप लगाने और रह गये विनती करने के लिए। लीग की विजय का इससे अधिक और कोई प्रबल प्रमाण नहीं हो सकता है।

तथापि एक समझौते पर पहुंचने के लिए श्री जिन्ना तथा लीग से बातचीत करने के बावजूद श्री गांधी ने एक भिन्न मोड़ लिया। उन्होंने कांगे्रस से 8 अगस्त, 1942 को ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन संबंधी प्रस्ताव पारित करा लिया। वर्तानिया सरकार के विरुद्ध यह प्रस्ताव एक चुनौती थी। परंतु अल्पसंख्यकों के मामले में वर्तानिया सरकार के हस्तक्षेप को समाप्त करने का यह एक प्रयास भी था, ताकि कांगे्रस उक्त विवाद को स्वतंत्रतापूर्वक, अपनी शर्तों तथा विचारों के अनुसार तय करने का अवसर पा सके। अन्य अल्पसंख्यकों तथा मुसलमानों की अवहेलना करके स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिए उक्त प्रस्ताव, हरादतन तो नहीं, लेकिन परिणामस्वरूप अवश्य था। उक्त भारत छोड़ो आंदोलन पूर्णतया असफल रहा। वह एक उन्मत्त साहस था, जिसने पैशाचिक रूप धारण कर लिया था। वह एक घर-फूंक नीति-आंदोलन था, जिसमें लूटमार, बलात्कार और हत्या के शिकार भारतीय थे और इस दुष्कृत्य को करने वाले कांगे्रस जन थे। पराजित होकर, महात्मा गांधी ने, जब वे जेल में थे, इससे पीछा छुड़ाने के लिए मार्च 1943 में 21 दिन का उपवास प्रारंभ कर दिया। वे असफल हुए, तदुपरांत बीमार हो गए। उनकी हालत धीरे-धीरे गिर रही थी, यह सूचना पाकर बर्तानिया सरकार ने उन्हें जेल से रिहा कर दिया, इस डर से कि कहीं उनके हाथों उनकी मृत्यु न हो जाए और उन्हें कलंक न लग जाए। जेल से बाहर आने पर गांधीजी को