उपसंहार
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(4) विभाजन की स्थिति में, सुरक्षा, व्यापार, संचार और अन्य
अनिवार्य प्रयोजनों के संरक्षण के लिए पारस्परिक समझौते किए जायेंगे।
(5) जनसंख्या का कोई भी स्थानांतरण पूर्ण ऐच्छिक आधार पर
होगा।
(6) उक्त शर्तें बर्तानिया सरकार द्वारा भारत को शासन की पूर्ण
सत्ता और दायित्व का स्थानांतरण किये जाने पर ही लागू होंगी।
ये बातें, जो 9 सिंतबर को प्रारंभ हुई, 18 दिन तक चलीं और यह घोषणा हुई कि वार्ता भंग हो गई है। परिणामस्वरूप, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर इसकी भिन्न-भिन्न प्रतिक्रिया हुई। कुछ लोग प्रसन्न थे और कुछ दुखी। परंतु चूंकि दोनों ही उक्त वार्ता के ठीक पूर्व, श्रेष्ठता की उपलब्धि के संघर्ष में अपने विरोधियों द्वारा शिकस्त खो चुके थे - श्री गांधी अंगे्रजों से और श्री जिन्ना पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी से, फिर भी अधिकांश जनता आशान्वित थी कि समस्या के समाधान का कोई उचित प्रयास उनके द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा। पर ऐसा नहीं हुआ। असफलता का कारण व्यक्तियों में दोषों का होना है, तथापि यह कहा जाना चाहिए कि सी.आर. सूत्र में भी कतिपय मौलिक दोषों के फलस्वरूप असफलता अनिवार्य थी। सी.आर. सूत्र में अनेक दोष हैं। सर्वप्रथम, उक्त सूत्र ने सांप्रदायिक प्रश्न को राजनयिक प्रश्न के साथ एक अटूट गांठ में बांध दिया। एकीकरण-कौशल के रूप में उसमें न कोई राजनयिक समझौता और न सांप्रदायिक समझौता है, जिसके आधार बिना ही उक्त सूत्र आगे बढ़ता है। उक्त सूत्र ने कोई समझौता-सूत्र प्रदान नहीं किया। इसने श्री जिन्ना को सौदेबाजी के लिए पे्ररित किया है। यह एक सौदेबाजी ही थी कि ‘स्वतंत्रता प्राप्त करने में यदि आप हमारी सहायता करेंगे, तो हम भी आपके पाकिस्तान के प्रस्ताव पर सहर्ष विचार करेंगे।’ मैं नहीं जानता कि श्री राजगोपालाचार्य को यह विचार कहां से मिला कि स्वतंत्रता प्राप्ति का यह सर्वोत्तम साधन है। यह संभव है कि श्री राजगोपालाचार्य ने यह विचार भारत के उन पुरातन हिंदू राजाओं से लिया हो जिन्होंने बाहरी शत्रुओं के आक्रमण के विरुद्ध अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपने पड़ोसी राजकुमारों को अपनी लड़कियां देकर संधि तथा मेल कर लिया था। श्री राजगोपालाचार्य इस बात को भूल गए कि इस प्रकार के मेल और संधियां न तो उत्तम पति ही उपलब्ध करा सकीं और न स्थायी मित्रता ही। इस प्रकार कार्य को आगे बढ़ाने में सांप्रदायिक समझौते को स्वतंत्रता की प्राप्ति का आधार मानना भारी मूर्खता का कार्य है। लोभ-लालच के रूप में सांप्रदायिक सुविधाएं प्रदान करना एक पार्टी को दूसरी पार्टी को जाल में फांसने का तरीका है। सी.आर. सूत्र ने सांप्रदायिक समझौते को एक बिकाऊ वस्तु बना दिया।