15. कौन निर्णय कर सकता है - Page 427

418 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

सी.आर. सूत्र में दूसरा अवगुण उस तंत्र से संबद्ध है, जो किसी समझौते को क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक है। उक्त सूत्र में इस कार्य के लिए जिस एजेंसी का सुझाव दिया गया, वह है अंतरिम सरकार। ऐसा करने में श्री राजगोपालाचार्य द्वारा दो कठिनाइयां स्पष्ट रूप से अनदेखी कर दी गईं। पहली कठिनाई यह है कि एक बार अस्थायी सरकार की स्थापना हो जाने के बाद संबंधित पार्टियों की प्रतिज्ञाओं में सहमति तथा एकबद्धता नहीं रहती। यह मामला पूरी की जाने वाली प्रतिज्ञा के विरुद्ध क्रियान्वित प्रतिज्ञा वाला हो जाता है। अस्थायी सरकार की स्थापना की स्वीकृति से लीग को स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए कांगे्रस की सहायता करने की प्रतीज्ञा का कार्यान्वयन करना पड़ता। परंतु पाकिस्तान लाने के लिए कांगे्रस की प्रतिज्ञा पूर्ण होने का कार्यान्वयन बाकी रह जाता। श्री जिन्ना आग्रह करते हैं, और ठीक करते हैं, कि प्रतिज्ञाएं एकबद्ध होनी चाहिए। पर क्या वे कभी अपने को उस स्थिति में रखने की स्वीकृति प्रदान कर सकते हैं? दूसरी कठिनाई, जिसकी श्री राजगोपालाचार्य ने अनदेखी की है, वह यह है कि यदि अस्थायी सरकार कांगे्रस द्वारा प्रदत्त समझौते वाले अंश को कार्यान्वित करने में असफल हो जाती है, तब क्या होगा? कौन इसको लागू करेगा? अस्थायी सरकार एक प्रभुत्वसंपन्न सरकार होगी और वह किसी उच्च सरकार पर आश्रित नहीं होगी। यदि उसके द्वारा उक्त समझौता कार्यान्वित नहीं किया गया, तो मुसलमानों के लिए विद्रोह के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह जाता। पाकिस्तान के लिए अस्थायी सरकार को संविधान बनाने का, कार्य सौंपना कोई भी स्वीकार नहीं करेगा। यह एक जाल है, समाधान नहीं। संवैधानिक परिवर्तन होने का एकमात्र प्रशस्त मार्ग संसदीय अधिनियम है, जिसमें वे नियम गर्भित होंगे, जो ब्रिटिश भारत के राष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण तत्वों द्वारा स्वीकृत किए गए हैं।

सी.आर. सूत्र में एक तीसरा दोष है। यह सूत्र रक्षा, विदेश-व्यापार, सीमा-शुल्क जैसे सांझे हित के मामलों के संरक्षण के लिए पाकिस्तान और हिंदुस्तान के बीच संधि के लिए उपबंध है। यहां पुनः श्री राजगोपालाचार्य स्पष्ट कठिनाइयों से अनभिज्ञ प्रतीत होते हैं। सांझे हितों के मामलों की सुरक्षा किस प्रकार संपन्न हो? मेरी समझ में इसके दो मार्ग हैं। प्रथम यह कि एक ऐसी केंद्रीय सरकार हो, जिसमें उक्त विषयों से संबद्ध कार्यकारिणी और संवैधानिक अधिकार निहित हों। इसका तात्पर्य यह हुआ कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान प्रभुत्वसंपन्न राज्य नहीं होंगे। क्या श्री जिन्ना इसे स्वीकार करेंगे? स्पष्ट है कि नहीं। दूसरा मार्ग यह है कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान प्रभुत्वसंपन्न राज्य बना दिए जाएं और सांझे हित के मामलों से संबद्ध एक संधि द्वारा उन दोनों को बांध दिया जाये। परंतु यह सुनिश्चित करने का तरीका बनाना होगा कि संधि की शर्तों का पालन होगा, क्योंकि पाकिस्तान प्रभुत्वसंपन्न राज्य के रूप में कभी भी