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उपसंहार

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इसका परित्याग कर सकता है, चाहे उसका डोमेनियन रूप क्यों न हो। उक्त धारा की रचना करने में श्री राजगोपालाचार्य को स्पष्टतः 1922 की एंग्लो-आइरिश संधि से पे्ररणा मिली प्रतीत होती है। परंतु वे इस तथ्य को भूल गए हैं कि उक्त संधि का अस्तित्व तब तक रहा जब तक आयरलैंड का स्वरूप डोमेनियन का नहीं हुआ और ज्यों ही वह डोमेनियन हो गया, उसने उस संधि का परित्याग कर दिया और ब्रिटिश संसद चुपचाप दांत पीसती रही, क्योंकि वह जानती थी कि वह कुछ नहीं कर सकेगी।

वार्ता भंग हो जाने का किसी को खेद नहीं हुआ। यदि किसी को खेद हुआ, तो इसलिए कि वार्ता उन प्रश्नों को स्पष्ट किए बिना भंग हो गई जिनके विषय में श्री जिन्ना ने अपने सार्वजनिक भाषणों में विवेकपूर्ण चुप्पी साधी हुई थी, यद्यपि उनके द्वारा निजी बातचीत में उन विषयों के बारे में अनेक बार कहा गया है। ये प्रश्न हैंः

(1) क्या मुस्लिम लीग के प्रस्ताव के फलस्वरूप पाकिस्तान को स्वीकार किया जाये?

(2) क्या मुस्लिम लीग से अलग योग्य मुसलमानों को इस मामले में कुछ नहीं कहना है?

(3) पाकिस्तान की सीमाएं क्या होंगी? क्या उसकी सीमाएं पंजाब और बंगाल की वर्तमान प्रशासकीय सीमाएं होंगी, या फिर वे सीमाएं प्राकृतिक आधार पर होंगी?

(4) लाहौर में पारित प्रस्ताव में उल्लिखित शब्दों, ‘आवश्यकतानुसार प्रदेशों के एकीकरण की शर्त के आधार पर’ का क्या अर्थ है? वे ऐसे कौन से प्रदेश हैं जिनके एकीकरण की बात लीग के दिमाग में है?

(5) लाहौर प्रस्ताव के अंतिम भाग में उल्लिखित शब्द ‘अंततोगत्वा’ का क्या अभिप्राय है? क्या लीग ने किसी एक अंतरिम अवधि की बात सोची है, जिसमें पाकिस्तान एक पूर्ण स्वतंत्र और सार्वभौम राज्य नहीं होगा?

(6) यदि श्री जिन्ना का प्रस्ताव यह है कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान की सीमाएं मौजूदा प्रशासकीय सीमाएं हों, तो क्या वह परिगणित जातियों को या यदि मैं यहां तक कहूं कि पंजाब और बंगाल में गैर-मुसलमानों को, मतदान द्वारा यह निर्णय लेने की आज्ञा देंगे कि क्या वे श्री जिन्ना के पाकिस्तान में सम्मिलित होने की इच्छा कर सकते हैं, अथवा पंजाब और बंगाल में गैर-मुस्लिम लोगों के मतदान के परिणाम को स्वीकार करने के लिए श्री जिन्ना तत्पर होंगे?

(7) पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान से जोड़ने के लिए क्या श्री जिन्ना यू.पी. और बिहार होते हुए कोई गलियारा चाहते हैं?