उपसंहार - Page 429

420 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

इससे बहुत लाभ होगा, यदि श्री जिन्ना से सीधे प्रश्न किए जाएं और उनके स्पष्ट उत्तर प्राप्त किए जाएं। परंतु इन प्रश्नों पर श्री जिन्ना के पकड़ में आने के बावजूद श्री गांधी ने अपना सारा समय इस बात को प्रमाणित करने में लगा दिया कि सी. आर. सूत्र वास्तव में लीग का वही लाहौर प्रस्ताव है। इस प्रकार उन्होंने उन प्रश्नों का स्पष्टकीरण प्राप्त करने का सर्वोत्तम अवसर खो दिया।

इन वार्ताओं के उपरांत श्री गांधी और श्री जिन्ना क्रिकेट-खिलाडि़यों की भांति क्रिकेट का खेल खत्म होने पर अपने-अपने खेमों में वापिस आ गए, जैसे कि आगे करने के लिए अब कुछ नही है। क्या वे पुनः मिलेंगे? और यदि हां, तो कब? इस बात की कोई सूचना नहीं है। इसके बाद क्या होगा? क्या यह प्रश्न उन्हें व्यथित करता हुआ प्रतीत नहीं होता? यह समझना कठिन है कि पाकिस्तान के सवाल को हल किए बिना भारत किस प्रकार अपना राजनीतिक उत्थान कर सकता है? पाकिस्तान का सवाल कोई उस वर्ग का सवाल नहीं है, जिस पर चर्चा करने का निषेध हो। यह प्रश्न उन प्रश्नों की श्रेणी का नहीं है, जिसके बारे में लोग इस बार सहमत होकर कि उनकी राय नहीं मिलती, प्रश्न को वहीं छोड़ दें। यह ऐसा प्रश्न है, जिनके समाधान की खोज करनी ही पड़ेगी। किंतु किस प्रकार? इसका समाधान या तो समझौते या मध्यस्थता द्वारा हो सकता है। यदि इसका समाधान समझौते द्वारा किया जाता है तो यह ‘इस हाथ ले और उस हाथ दे’ के अनुसार होना चाहिए, न कि एक पार्टी के समक्ष आत्मसर्पण द्वारा। उसे समझौता नहीं कहा जा सकता। वह आज्ञा देना होगा। अंततोगत्वा अच्छी भावना का उदय हो और दोनों पार्टियां एक समझौते पर पहुंच जाएं। परंतु समझौते में लंबा समय लग सकता है। यह समय और अधिक लम्बा हो, इसके पूर्व ही किसी सद्भावना का उदय होना चाहिए। पर यह कोई नहीं बता सकता कि इसमें कितना समय लगेगा। भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसको टाला नहीं जा सकता और सांप्रदायिक समस्या के समाधान के बिना इसमें जल्दबाजी भी नहीं की जा सकती। इसे समझौते पर आधरित करने का अर्थ इसके समाधान का अनिश्चित काल के लिए टालना है। अतः दूसरा रास्ता

खोजना चाहिए। मुझे लगता है कि इसका सर्वोत्तम मार्ग किसी अंतर्राष्ट्रीय बोर्ड द्वारा इसमें मध्यस्थता है। पाकिस्तान के प्रश्न को गर्भित करते हुए अल्पसंख्यकों की समस्या में विवादग्रस्त विषय उक्त अंतर्राष्ट्रीय बोर्ड को सौंप दिये जाने चाहिए। उक्त बोर्ड में ब्रिटिश साम्राज्य से बाहर के अन्य बाहरी देशों के सदस्य नियुक्त हों। भारत में विधि-विहित प्रत्येक अल्पसंख्यक जाति-मुस्लिमों, परिगणित जातियों, सिक्खों तथा भारतीय ईसाइयों से उक्त बोर्ड में अपने-अपने प्रतिनिधि चुनने को कहा जाए। अपनी मांगों के समर्थन में ये अल्पसंख्यक जातियां तथा हिंदू लोग बोर्ड के सम्मुख उपस्थित हों और उक्त बोर्ड द्वारा प्रदत्त निर्णय को मान्यता प्रदान करें। ब्रिटिश सरकार द्वारा