परिशिष्ट - Page 448

परिशिष्ट 439

यूरोपीय प्रतिनिधि संस्थान

हमें आशा है कि महामहिम आरंभ में हमारे इस कथन पर हमें क्षमा करेंगे कि यूरोपीय किस्म के प्रतिनिधि संस्थान भारतीय लोगों के लिए नए हैं_ हमारे संप्रदाय के अधिकांश विचारशील सदस्यों में से अनेक सदस्यों की वास्तव में भावना है कि यदि उन्हें, भारत में बनने वाली सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक परिस्थितियों में, सफलतापूर्वक अपनाया जाता है तो इसके लिए अत्यधिक सावधानी दूरदर्शिता और सतर्कता बरतना आवश्यक होगा, और इस प्रकार की सावधानी और सतर्कता को अपनाए बिना, हमारी अन्य बुराइयों के साथ-साथ हमारे राष्ट्रीय हितों को एक गैर-सहानुभूतिपूर्ण बहुमत की दया पर निर्भर रहना पड़ेगा। तथापि, चूंकि हमारे शासकों ने अति प्राचीन सहज ज्ञान और परंपराओं के अनुसरण में इन संस्थानों को देश की सरकार में उत्तरोत्तर महत्वपूर्ण स्थान देना उचित समझा है, इसलिए हम मुसलमान अपने स्वयं के राष्ट्रीय हितों के पक्ष में उन परिस्थितियों में भागीदार बनने से स्वयं को अलग-थलग नहीं रख सकते हैं, जिसमें उस नीति को तैयार किया गया है। इसलिए जहां हम आभारपूर्वक यह स्वीकार करते हैं कि भारत के मुसलमानों को इस समय जो प्रतिनिधित्व प्राप्त है, वह आप महामहिम और आपसे पूर्ववर्ती प्रसिद्ध वाइसराय तथा स्थानीय सरकारों के प्रमुखों के मन में न्याय और निष्पक्षता की भावना के कारण है, जो विधायी चेम्बरों के मुसलमान सदस्यों को निरपाद रूप से नामनिर्देशित करते रहे हैं_ वही यह टिप्पणी भी करने को विवश हैं कि हमें इस प्रकार दिया गया प्रतिनिधित्व हमारी अपेक्षाओं से अपर्याप्त है और इन्हें उस निकाय का सदैव अनुमोदन प्राप्त नहीं होता है, जिनमें प्रतिनिधित्व के लिए उनका नामनिर्देशित किया जाता है। इस प्रकार की बातें विद्यमान परिस्थितियों में अपरिहार्य हैं, क्योंकि एक ओर तो वाइसराय और स्थानीय संस्थानों के लिए आरक्षित नामनिर्देशनों की संख्या सीमित है और दूसरी ओर वास्तविक प्रतिनिधि समझ वाले व्यक्तियों का चयन करना, लोकप्रिय चुनाव की दिशा दर्शाने वाली किसी विश्वसनीय प्रणाली के अभाव में, आसान नहीं है।

निर्वाचन के परिणाम

जहां तक निर्वाचन के परिणामों का संबंध है, इस समय गठित निर्वाचन निकायों द्वारा किसी मुसलमान उम्मीदवार का नाम सरकार के अनुमोदन के लिए देना बिल्कुल संभव नहीं है, जब तक वह हम महत्त्वपूर्ण मामलों में बहुसंख्यकों के साथ सहानुभूति न रखता हो। न ही हम निष्पक्षता के रूप में अपने गैर-मुसलमान साथियों की इस इच्छा में कोई दोष पाते हैं कि वे अपनी संख्या और अपने संप्रदाय के सदस्यों को वोट देने का पूरा-पूरा लाभ उठाएं अथवा उन लोगों को वोट देने का लाभ उठाएं, जो गैर-हिन्दू हैं जिनसे हिन्दू बहुसंख्यकों के साथ वोट देना अपेक्षित माना जाता है,