परिशिष्ट 441
है। इससे प्रतिस्पर्धी घटक को इसके विकृत रूप से पेश करना आरंभ हो गया है और महामहिम, हम आपकी अनुमति से आपका ध्यान सभी शासकीय शक्तियों में एक वर्ग के एकाधिकार के राजनीतिक महत्व की ओर दिलाना चाहते हैं। इस संदर्भ में हम यह भी उल्लेख करना चाहते हैं कि मुसलमान शिक्षाविदों के प्रयास उनके बीच आरंभ किए गए शैक्षिक अभियान के प्रारंभ से ही चरित्र-निर्माण की दिशा में चल पड़े थे, और हमें लगता है कि यह गुण केवल अच्छा सरकारी सेवक बनाने में मानसिक जागरूकता पैदा करने से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
खंडपीठ में मुसलमान
हमें यह अनुरोध करने का हक है कि भारत के सभी भागों में मुसलमान सामान्यतः इस बात से दुःखी हैं कि उच्च न्यायालयों और न्यायपालिका के प्रमुख न्यायालयों में मुसलमान न्यायाधीशों को प्रायः नियुक्त नहीं किया जाता। इन न्यायालयों की स्थापना के बाद अब तक केवल तीन मुसलमान वकीलों को ये सम्माननीया पद प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने खण्डपीठ में अपनी नियुक्ति को युक्तिसंगत सिद्ध किया। इस समय एक भी मुसलमान न्यायाधीश इन न्यायालयों में नियुक्त नहीं है, जबकि कलकत्ता उच्च न्यायालय में तीन हिन्दू न्यायाधीश हैं, जहां जनसंख्या में मुसलमानों का अनुपात अधिक है और पंजाब के मुख्य न्यायालय में दो न्यायाधीश हैं, जहां जनसंख्या में मुसलमानो बहुमत में हैं। इसलिए यह हमारा अति महत्वकांक्षी अनुरोध नहीं है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय और प्रमुख न्यायालयों में एक-एक मुसलमान न्यायाधीश नियुक्त किया जाए। इन नियुक्तियों के लिए योग्य पात्र मुसलमान वकील एक प्रांत में नहीं हों तो दूसरे प्रांत में उपलब्ध हो सकते हैं। हम यह कहने की भी अनुमति चाहते हैं कि इन न्यायालयों की खण्डपीठ में मुस्लिम विधि के ज्ञाता न्यायाधीश की उपस्थित से न्याय-प्रशासन को पर्यात शक्ति प्राप्त होगी।
न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व
चूंकि नगरपालिका और जिला बोर्डों को महत्त्वपूर्ण स्थानीय हितों की देखभाल करनी होती है जो बहुत हद तक स्वास्थ्य सुविधाओं, शैक्षिक आवश्यकताओं, यहां तक कि नगरवासियों के धार्मिक हितों को भी प्रभावित करते हैं। हम आशा करते हैं कि यदि हम महामहिम का ध्यान उच्च हितों से पूर्व इनमें मुसलमानों की स्थिति की ओर दिलाते हैं, तो वे हमें क्षमा करेंगे। जैसा कि ज्ञात है, ये संस्थान स्वाशासन की सीढ़ी की आरंभिक सीढि़यां हैं और जैसा कि सुझाव दिया गया है, लोगों की बुद्धिमत्त के अनुसार प्रतिनिधित्व का सिद्धांत लागू किया जाए। फिर भी इन बोर्डों में मुसलमानों की स्थिति का इस समय किसी ऐसे भावविभूति सिद्धांत द्वारा विनियमन नहीं किया