परिशिष्ट 445
अतीत में की गई सहायता
मुसलमान लोगों को सरकारी सेवा में स्वयं को पात्र बनाने में सहायता करने के ब्रिटिश प्रयासों पर नजर डालना रुचिकर है। वारेन हैस्टिंग ने 1782 में कलकत्ता-मद्रास की स्थापना की, ताकि इसके क्षात्र सरकारी संस्थानों के अंतर्गत रोजगार के लिए हिन्दुओं के साथ अधिक समान शर्तों पर प्रतिस्पर्धा में भाग ले सकें। मेरे पूर्वज लार्ड मिंटो ने 1811 में मदरसा के सुधार और पूरे भारत में अन्य स्थानों पर मुस्लिम महाविद्यालयों की स्थापना करने की वकालत की थी। बाद के वर्षों में मुसलमान एसोसिएशन के प्रयासों से मुसलमान समुदाय की शैक्षिक स्थिति और सरकारी सेवा में उनके नियोजन के बारे में 1855 का सरकारी संकल्प पारित किया गया, जबकि मुस्लिम शैक्षिक प्रयासों की परिणति अलीगढ़ विश्वविद्यालय के रूप में महान संस्थान की स्थापना हुई, जिसे योग्य और उदारमना सर सैयद अहमद खान ने अपने सहधार्मियों को समर्पित किया।
अलीगढ़ महाविद्यालय
जुलाई, 1877 में लार्ड लिट्टन ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी, जहां सर सैयद अहमद खान ने वायसराय को इन स्मरणीय शब्दों में संबोधित किया थाः ‘आपने जो वैयकित्क सम्मान मुझे दिया है, उससे मैं इस महान तथ्य के प्रति आश्वस्त हुआ हूं और मुझमें मात्र वैयक्तिक कृतज्ञता से भी अधिक की भावना भर गई है। इस अवसर पर मुझे यह विश्वास हो गया है कि आप ब्रिटिश शासन का प्रतिनिधित्व करते हैं, और हमारे परिश्रम के प्रति आपको सहानुभूति है और आश्वासन बहुत महत्वपूर्ण है, और हमारे लिए प्रसन्नता का स्रोत है। अपने जीवन काल में मेरे लिए यह अनुभव करना अत्यंत सुखद है कि वर्षों पहले की गई घोषणा ने जो मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य रही है, ने एक ओर तो मेरे अपने देशवासियों में ऊर्जा भर दी है और दूसरी ओर हमारे ब्रिटिश सह-नागरिकों की सहानुभूति प्राप्त कर ली है और हमारे शासकों का समर्थन प्राप्त कर लिया है, ताकि जितने वर्ष मेरे हिस्से के बचे हैं और जब मैं आपके बीच नहीं रहूंगा, यह कालेज फले-फूलेगा और मेरे देशवासियों को अपने देश के लिए वही प्रेम, ब्रिटिश शासन के प्रति वही निष्ठा की भावना, इसके आशीर्वाद के वही मूल्यांकन, हमारे ब्रिटिश सह-नागरिकों के प्रति वही सच्ची मैत्री की भावना जगाने में सफल रहेगा, जो मेरे जीवन की मार्गदर्शी भावना रही है।’’