3. अधःपतन से मुक्ति - Page 46

एकता का विघटन

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सन् 1001 में गजनी के मुहम्मद के भीषण आक्रमणों का तांता लग गया। मुहम्मद की मृत्यु 1030 ई. में हो गई, परन्तु तीस वर्ष की अल्पावधि में ही उसने भारत पर सत्रह बार आक्रमण किया था। उसके बाद 1173 ई. में मुहम्मद गोरी ने भारत पर आक्रमण किया। वह 1206 ई. में मारा गया। तीस साल तक गजनी के मुहम्मद ने भारत को रौंदा और तीस साल तक उसी तरह मुहम्मद गोरी भी इस देश को रौंदता रहा। उसके बाद चंगेज़ खान के मंगोल झुंडों ने धावे बोले। ये आक्रांता 1221 ई. में आए। तब उन्होंने भारत की सीमाओं पर ही आक्रमण किए, भीतर प्रविष्ट नहीं हुए। लेकिन बीस वर्ष बाद उन्होंने लाहौर पर धावा बोला और उसे लूटा। उन हमलों में से सर्वाधिक भीषण हमला 1398 में तैमूर लंग के नेतृत्व में हुआ। उसके बाद बाबर के रूप में एक नया आक्रांता उभरा, जिसने 1526 ई. में भारत पर हमला किया। दो और आक्रमण भी हुए। 1738 ई. में आक्रांता नादिर शाह के नेतृत्व में पंजाब पर चढ़ दौड़े। उनका यह आक्रमण नदी में आई भीषण बाढ़ या फिर सागर के रौद्र रूप जैसा था। उसके बाद 1761 ई. में अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर हमला किया। उसने पानीपत में मराठों की सेनाओं को पराजित किया और हिंदुओं द्वारा मुस्लिम आक्रांताओं के हाथों गंवाए गए आधार को पुनः प्राप्त करने के लिए होने वाले प्रयासों की हमेशा के लिए कमर तोड़ दी।

मुस्लिम हमले मात्र लूटमार अथवा विजय की आकांक्षा से प्रेरित होकर ही नहीं किए गए थे। इनके पीछे एक और उद्देश्य भी था। मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर जो हमला किया, उसका स्वरूप दंडात्मक भी था। वह सिंध सम्राट दाहिर को सजा देने के लिए हुआ था, जिसने देवल में, जोकि सिंध का एक बंदरगाह था, पकड़े गए एक अरब जहाज को मुक्त करने से इन्कार कर दिया था। परंतु इस बात में भी कोई संदेह नहीं कि भारत में मूर्ति-पूजा और हिंदुओं के बहुदेववाद पर प्रहार कर यहां इस्लाम की स्थापना भी इन हमलों का एक उद्देश्य था। हज्जाज को भेजे गए एक पत्र में मोहम्मद बिन कासिम का यह उल्लेख हैः

फ्राजा दाहिर के भतीजे, उसके योद्धाओं और प्रमुख अधिकारियों को ठिकाने

लगा दिया गया है और मूर्तिपूजकों को या तो इस्लाम में दीक्षित कर दिया

गया है अथवा उन्हें तबाह कर दिया गया है। मूर्तियों वाले मंदिरों के स्थान

पर मस्जिद और अन्य इबादत-स्थल बनाए गए हैं, कुतबाह पढ़ी जाती है,

अज़ान दी जाती है, ताकि निर्धारित घंटों पर इबादत हो सके। तकबीर और

अल्लाह-हो-अकबर की सदाएं हर सवेरे-शाम गूंजती हैं।ऽय्

ऽ1. 2, वही. पृ. 10