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460 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

गई है। इन स्थानों को उन विशेष निर्वाचन क्षेत्रों से, जिनमें केवल ‘दलित वर्गों’ के पात्र मतदाताओं को मतदान का अधिकार होगा, मतदान द्वारा भरा जाएगा। इस प्रकार के किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र में मतदान करने वाला कोई व्यक्ति, जैसा कि ऊपर कहा गया है, सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में भी मतदान करने का अधिकार होगा। तात्पर्य यह है कि इन निर्वाचन क्षेत्रों का गठन उन विशिष्ट क्षेत्रों में किया जाएगा, जहां दलित वर्ग अधिक संख्या में होंगे, और यह कि मद्रास को छोड़कर, किसी प्रांत के संपूर्ण क्षेत्र को इसके अंतर्गत नहीं लाया जाएगा।

बंगाल में यह संभव लगता है कि कुछ सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में दलित वर्गों के मतदाताओं का बहुमत होगा। तद्नुसार, आगे और जांच होने तक, उस प्रांत में विशेष दलित वर्ग निर्वाचन क्षेत्रों से सदस्यों के निर्वाचन हेतु कोई संख्या नियत नहीं की गई है। आशय यह है कि बंगाल विधानमंडल में दलित वर्गों के लिए कम से कम 10 स्थान सुनिश्चित किए जाएं।

प्रत्येक प्रांत में उन व्यक्तियों की (यदि वे निर्वाचक के तौर पर पात्र हों), जो विशेष दलित वर्ग निर्वाचन क्षेत्र में मतदान करने के पात्र होंगे, कोई निश्चित परिभाषा अंतिम रूप से तय नहीं की गई है। इसे मताधिकार समिति की रिपोर्ट में दिए गए सामान्य सिद्धांतों के आधार पर एक नियम के रूप में निश्चित किया जायेगा। उत्तरी भारत के कुछ प्रांतों में इसमें संशोधन करना आवश्यक हो सकता है, जहां छुआछूत के सामान्य मापदंड को लागू करने के कारण कोई ऐसी परिभाषा बन जाये जो किन्हीं मामलों में प्रांत की विशेष परिस्थितियों के अनुकूल न हो।

महामहिम की सरकार यह नहीं मानती है कि ये विशेष दलित वर्ग निर्वाचन क्षेत्रों की एक सीमित समयावधि से अधिक आवश्यकता होगी। वे विहित करते हैं कि संविधान में यह उपबंध होगा कि वे 20 वर्ष के बाद समाप्त हो जाएंगे, यदि उन्हें निर्वाचक संबंधी पुनरीक्षण की सामान्य शक्तियों के अंतर्गत, जैसा कि पैरा 6 में कहा गया है, पहले समाप्त नहीं किया गया हो।

  1. भारतीय ईसाइयों को आवंटित स्थानों के लिए चुनाव पृथक सांप्रदायिक मतदाता क्षेत्र में मतदान करने वाले मतदाताओं द्वारा किया जाएगा। ऐसा निश्चित लगता है कि संभवतः मद्रास को छोड़कर, व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण प्रांत के संपूर्ण क्षेत्र को शामिल करके भारतीय ईसाई निर्वाचन क्षेत्र का गठन नहीं किया जा सकेगा। और यह कि तद्नुसार प्रांत के एक या दो चुने हुए क्षेत्रों में ही विशेष भारतीय ईसाई निर्वाचन क्षेत्रों का गठन करना संभव होगा। इन क्षेत्रों से बाहर रहने वाले भारतीय ईसाई सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में मतदान करेंगे। बिहार और उड़ीसा में विशेष व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ सकती है, जहां बड़े अनुपात में भारतीय ईसाई समुदाय के लोग देशज जनजातियों से सम्बद्ध हैं।