एकता का विघटन
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उसकी प्रतिमा को ले जाने का साहसिक कृत्य करने वाले के रूप में
व्यापक तौर पर चर्चित हो गया था। उसका यह भी दावा था कि मूर्ति के
चार टुकड़े कर दिए गए थे। उसका एक भाग गज़नी की जामी मस्जिद में
जमा कराया गया, एक को उसने शाही महल के प्रवेश द्वार पर रखा और
तीसरा भाग मक्का तथा चौथा मदीना भेजा गया।य्ऽ
लेन पूल ने कहा है कि मुहम्मद गज़नी ने, जिसने यह संकल्प किया था कि वह हिंदुस्तान के काफिरों के खिलाफ हर वर्ष जिहाद करेगा और तब तक अपना मूर्ति-भंजन-अभियान चलाता रहेगा जब तक कि सोमनाथ का मंदिर अक्षत है। इसी विशेष उद्देश्य से उसने अपनी जीवन-लीला समाप्त होने से कुछ ही समय पूर्व मुलतान के अन्हलवाड़ा में तटवर्ती क्षेत्र के रेगिस्तान को पार कर भयानक चढ़ाई की और वह तब तक युद्ध करता रहा, जब तक कि उसने अंततोगत्वा इस सुप्रसिद्ध मंदिर को ध्वस्त नहीं कर दियाः
फ्वहां लाखों तीर्थ-यात्री एकत्रित होते थे, एक हजार ब्राह्मण इस देवालय में
पूजन-वंदन करते थे और इसके कोष की रक्षा करते थे, सैकड़ों नर्तक और
गायक उसके द्वार पर अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। इसके अंदर सुप्रसिद्ध
लिंग था, जो पाषाण का एक स्थूल स्तंभ था। उस पर हीरे-जवाहरात जड़े
हुए थे और वह रत्नजडि़त दीपाधार से सजे-धजे थे और इस देवालय को
महिमामंडित करते थे। उसकी प्राचीरों पर काफिर ब्राह्म्णों के झुंड एकत्रित
रहते थे, जो उन विदेशी काफिरों के निष्फल दर्प का परिहास करते थे
जिनके बारे में वे सोचते थे कि उन्हें सोमनाथ भगवान सुनिश्चित रूप से
लील लेंगे। विदेशी निर्द्वंद्व दीवारों पर चढ़ गए। भगवान अपने सेवकों की
प्रार्थनाओं पर भी मूक बना रहा। पचास हजार हिंदुओं ने अपनी आस्था के
कारण यातना भोगी और इस पवित्र देवालय को सच्ची आस्था वालों ने
सोल्लास लूटा। वह महान पाषाण ध्वस्त कर दिया गया और उसके खंडों
को विजेता के महल की शोभा बढ़ाने के लिए ले जाया गया। मंदिर के
द्वारा गज़नी में लगाए गए और मूर्तिपूजकों को दस लाख पौंड मूल्य का
खजाना पुरस्कार तुल्य प्राप्त हुआ।य्ऽ
गज़नी के मुहम्मद द्वारा किया गया कृत्य एक पावन परंपरा बन गया और उसके बाद के आक्रांताओं ने उसका निष्ठापूर्वक पालन किया। डॉ. टाइटस के शब्दों मेंः
फ्मोहम्मद गोरी ने, जो मुहम्मद गज़नी का एक उत्साही उत्तराधिकारी था,
ऽ डॉ. टाइटस, इंडियन इस्लाम, पृ. 22-23