44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
पाना सर्वोच्च महत्व बन गया। राज्य की नीति का यह एक भाग ही बन
गया कि सारे देश का धर्म इस्लाम ही बनाया जाए।
फ्कुतुबुद्दीन ऐबक ने, जिसकी ख्याति मंदिरों को तोड़ने में लगभग
उतनी ही थी जितनी बारहवीं शताब्दी के अंतिम चरण और तेरहवीं शताब्दी
के प्रारंभ में मुहम्मद की थी, धर्मांतरण के लिए ताकत का सहारा भी
अक्सर लिया था। एक दृष्टांत दिया जा सकता हैः जब वह 1194 ई. में
कोइल (अलीगढ़) पहुंचा तो तोपखाने में जो लोग चतुर और निपुण थे,
उन्हें इस्लाम में दीक्षित कर लिया गया और अन्य लोगों को तलवार से मौत
के घाट उतार दिया गया।
फ्धर्मांतरण के लिए बाध्य करने हेतु जो कठोर कदम उठाए गए,
वे अनेकानेक थे। एक हृदय-विदारक मामले का उल्लेख फिरोजशाह के
शासन-काल (1351-1388) का है। दिल्ली के एक ब्राह्मण पर आरोप
लगाया गया कि वह अपने घर में मूर्तियों की पूजा करता है और यह भी
कि वह मुस्लिम महिलाओं को काफिर बना रहा है। उसको पकड़ा गया
और उसका मामल न्यायाधीशों, चिकित्सकों, बुजुर्गों और वकीलों के समक्ष
पेश किया गया। उन्होंने उत्तर दिया कि कानून के प्रावधान सुस्पष्ट हैं।
ब्राह्मण या तो मुसलमान बन जाए अथवा उसे जला दिया जाए। उसे सच्चे
दीन से अवगत करा दिया गया और सही राह भी उसे दिखा दी गई, परंतु
उसने उसे मानने से इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप सुलतान के आदेश
से उसे जला दिया गया और टिप्पणीकार ने लिखा है कि - कानून और
इंसाफ के प्रति सुल्तान के गहन लगाव को देखो कि किस तरह से वह
उसके आदेशों से तनिक भी नहीं डिगते।य् ख्1,
मुहम्मद ने मंदिर ही नहीं तोड़े, अपितु जिन हिंदुओं पर उन्होंने विजय प्राप्त की थी, उन्हें गुलाम बनाना भी उन्होंने अपनी नीति बना ली। डॉ. टाइटस के शब्दों मेंः
फ्इस्लाम के भारत से संपर्क में आने की प्रारंभिक अवधि में ही न केवल
काफिरों का संहार और उनके मंदिरों का विध्वंस ही किया गया, अपितु,
जैसा कि हमने देखा है, पराजितों में से अनेक गुलाम भी बना लिए गए।
इन आक्रमणों में लूट के माल का सरदारों और सामान्य सैनिकों के बीच
बंटवारा एक विशेष आकर्षण था। प्रतीत होता है कि मुहम्मद ने काफिरों
के संहार, उनके मंदिरों और पुजारियों की संपदा की लूट को अपने हमलों
का एक विशेष उद्देश्य बना लिया था। बताया जाता है कि अपने पहले
ऽ डॉ. टाइटसः ‘इंडियन इस्लाम’, पृ. 22