एकता का विघटन
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हमले में ही वह बहुत अधिक लूट का माल और आधे लाख सुंदर पुरुष
और महिला हिंदुओं को गुलाम बनाकर गज़नी ले गया थाय्। ख्2,
1070 ई. में जब मुहम्मद ने कन्नौज पर कब्जा किया तो उसने इतनी अधिक संपदा लूटी और लोगों को बंदी बनाया कि फ्उनकी गणना करने वालों की उंगलियां थक गईं।य् 1019 ई. के आक्रमण के बाद गज़नी और मध्य एशिया में भारतीय गुलाम कितने आम हो गए थे, उसका विवरण करते हुए उस समय का एक इतिहासकार कहता हैः ख्3,
फ्बंदियों की संख्या का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि हर
गुलाम को दो से दस दिरहम तक बेचा गया। बाद में ये गज़नी ले जाए
गए और सुदूर नगरों से व्यापारी उन्हें खरीदने आए और गोरे और काले,
धनी और निर्धन एक सांझी दासता में जकड़ लिए गए।य्
फ्सन् 1202 ई. में जब कुतुबुद्दीन ने कालिंजर पर अधिकार कर
लिया मंदिरों को मस्जिदों में बदलने और मूर्तिपूजा का नाम-निशान मिटाने
के बाद पचास हजार लोग गुलामी के बंधन में जकड़े गए और मैदान
हिंदुओं से ठसाठस भरा काला सा दिखाई देने लगा।य्
जिहाद में जो हिंदू पकड़े जाते, गुलामी ही उनका प्रारब्ध बनती थी। परंतु जब युद्ध नहीं होता था तब भी हिंदुओं का अपमान मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा अपनाए गए हथकंडों का कम महत्वपूर्ण भाग नहीं था। अलाउद्दीन के शासनकाल में चौदहवीं शताब्दी के प्रारंभ में कुछ इलाकों में हिंदुओं ने सुल्तान को काफी परेशान किया था। अतएव उसने उन पर ऐसे कर लगाने का फैसला किया जिससे वे पुनः विद्रोह करने का साहस न कर सकें।
फ्हिन्दुओं को इस स्थिति में ला दिया गया था कि वे सवारी के लिए घोड़ा
नहीं रख सकें, न ही अच्छे वस्त्र पहन सकें और न ही जीवन का कोई
और सुखोपयोग कर सकें।य् ख्1,
जजिया कर लगाए जाने के बारे में डॉ. टाइटस कहते हैंः
फ्हिंदुओं द्वारा जजिया का चुकाया जाना मुसलमानों, बादशाहों और शाहों
के शासनकाल में भारत के विभिन्न भागों में न्यूनाधिक नियमित ही था,
हालांकि कानून अक्सर मात्र सिद्धांततः ही लागू था, क्योंकि यह बादशाह
की अपनी मांगों को लागू कराने की योग्यता पर ही पूर्णतः निर्भर था। परंतु
डॉ. टाइटसः ‘इंडियन इस्लाम’, पृ. 31-32
वही, पृ. 24
वही, पृ. 26