46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अंततः यह महान अकबर के शासनकाल के नौंवें वर्ष (1665 ई.) में सारे
मुगल साम्राज्य में हटा दिया गया, जबकि इससे पहले यह आठ शताब्दियों
से भी अधिक तक भारत में मुस्लिम शासन का एक बुनियादी हिस्सा बना
रहा था।य् ख्2,
लेन पूल कहते हैं किः
फ्हिंदुओं पर कर उनकी भूमि के उत्पादन में से आधा तक था और उन्हें
अपनी सभी भैंसों, बकरियों और अन्य दुधारू पशुओं पर भी कर चुकाना
पड़ता था। धनी और निर्धन सभी को प्रति एकड़ और प्रति पशु की दर से
समान रूप से कर चुकाना होता था। कोई भी संग्राहक या अधिकारी, जो
रिश्वत लेता था, उसे सरसरी तौर पर सुनवाई के बाद बर्खास्त कर दिया
जाता था और उसकी बेंतों, चिमटों से पिटाई की जाती थी और मुश्कें और
हथकडि़यां-बेडि़यां डालने जैसी कड़ी सजा दी जाती थी। नए नियमों को
कड़ाई से लागू किया जाता था ताकि एक राजस्व अधिकारी बीस विशिष्ट
हिंदुओं को शिकंजे में कसकर उन पर घूसों से प्रहार करें और वसूली
कर सकें। किसी भी हिंदू घर में सोना अथवा चांदी तो क्या, सुपारी, जिसे
किसी खुशी के अवसर पर पेश किया जाता है, तक भी दिखाई नहीं देती
थी_ और असहाय बना दिए गए देशज अधिकारियों की पत्नियों को मुस्लिम
परिवारों में नौकरी करके गुजारा करना पड़ता था। राजस्व अधिकारियों को
प्लेग से भी ज्यादा घातक माना जाने लगा था और किसी का भी सरकारी
लिपिक बनाया जाना मौत से भी बुरा माना जाता था, यहां तक कि कोई
हिंदू ऐसे किसी व्यक्ति से अपनी बेटी का विवाह नहीं करना चाहता था।ऽ
उस समय के इतिहासकार का कथन है कि ये राजाज्ञाएं इतनी कठोरता से लागू की गई थीं कि चौकीदार, खूट और मुकद्दिम घोड़े की सवारी नहीं कर सकते थे, हथियार नहीं रख सकते थे, न ही अच्छे कपड़े पहन सकते थे और पान भी नहीं चबा सकते थे... कोई भी हिंदू अपना सिर नहीं उठा सकता था... वसूली करने के लिए घूंसे मारा जाना, माल भत्ता जब्त किया जाना, कैद और बेडि़यां डाले जाने आदि सभी तरीके अपनाए जाते थे। यह सब कुछ सनक अथवा नैतिक विकृति मात्र का ही परिणाम नहीं था। जो कुछ किया जाता था वह व्यापक तौर पर इस्लाम के रहनुमाओं की हाकिमों के रूप में सोच के अनुरूप होता था। सुलतान अलाउद्दीन ने मुस्लिम कानून के अंतर्गत हिंदुओं की स्थिति के बारे में काज़ी से सवाल किया तो काज़ी ने इन्हीं विचारों को भली-भांति स्पष्ट किया था। उसने कहा थाः
डॉ. टाइटसः ‘इंडियन इस्लाम’, पृ. 29
वही, पृ. 30