48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
इन आक्रमणों की पहली परिणति उत्तरी भारत और शेष भारत की एकता का विखंडन थी। मुहम्मद गज़नी ने उत्तरी भारत की अपनी विजय के बाद इसे शेष भारत से अलग कर दिया और इस पर गज़नी ने शासन किया। जब एक विजेता के तौर पर मोहम्मद गोरी सामने आया तो उसने इसे पुनः भारत में मिला दिया और इस पर पहले लाहौर से और फिर दिल्ली से शासन किया। अकबर के भाई हाकिम ने काबुल और कंधार को भारत से पृथक किया। अकबर ने उसे पुनः उत्तरी भारत में मिला दिया। सन् 1738 में नादिरशाह ने इन्हें पुनः अलग कर दिया और यदि सिखों के उत्थान ने अवरोध पेश नहीं किया होता तो समूचा उत्तरी भारत ही भारत से कट गया होता। अतएव उत्तरी भारत एक रेलगाड़ी में लगे डिब्बे जैसा रहा, जिसे संचालन की परिस्थितियों के अनुसार जोड़ा या अलग किया जा सकता है। यदि सादृश्य ही अपेक्षित हो तो अलसास लौरेन का उदाहरण दिया जा सकता है। अलसास लौरेन मूलतः जर्मनी का एक भाग था, जैसे कि शेष स्विट्जरलैंड और निचले देश थे। उसकी यही स्थिति 1680 ई. तक बनी रही, जब उसे फ्रांस ने ले लिया और फ्रांसिसी क्षेत्र में विलीन कर लिया। 1871 तक यह फ्रांस का भाग रहा। उसी वर्ष इसे जर्मनी ने अलग कर अपने क्षेत्र का एक हिस्सा बनाया। 1918 ई. में वह फिर जर्मनी से अलग होकर फ्रांस का हिस्सा बना और 1940 ई. में फिर जर्मनी का भाग बना दिया गया।
आक्रांताओं ने जो हथकंडे अपनाए थे, वे अपने पीछे भविष्य में आने वाले परिणाम छोड़ते गए। उनमें से ही एक हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की कटुता है, जो उन उपायों की देन है। दोनों के बीच यह कटुता इतनी गहराई से पैठी हुई है कि एक शताब्दी का राजनीतिक जीवन इसे न तो शांत कर पाने में सफल हुआ है और न ही लोग उस कटुता को भुला पाए हैं। क्योंकि इन हमलों के साथ ही साथ मंदिरों का विध्वंस, बलात् धर्मांतरण, संपत्ति की तबाही, संहार और गुलामी तथा नर-नारियों और बालिकाओं का अपमान हुआ था, अतएव क्या यह कोई आश्चर्यजनक बात है कि ये हमले सदैव याद बने रहे हैं। ये मुसलमानों के लिए गर्व का स्रोत बने तो हिंदुओं के लिए शर्म का। परंतु इन बातों के अलावा, भारत का यह पश्चिमोत्तर कोना एक ऐसा मंच भी रहा है जिस पर एक निर्मम नाटक खेला जाता रहा। मुसलमानों के दल एक के बाद दूसरी लहर के रूप में इस क्षेत्र पर चढ़कर आते रहे और वहां से उन्होंने स्वयं को शेष भारत में छितराया। ये छोटी-छोटी धाराओं के रूप में शेष भारत में पहुंचे। समय आने पर वे अपनी सुदूरतम सीमाओं से पीछे भी हटे। जबकि वे वहां रहे तो उन्होंने भारत के इस पश्चिमोत्तर कोने में आर्य-संस्कृति पर इस्लामी संस्कृति का गहन प्रभाव भी छोड़ा, जिसने धार्मिक और राजनीतिक दोनों की दृष्टि से इसे एक सर्वथा अलग रंगत दे दी। मुस्लिम आक्रांता निस्संदेह हिंदुओं के विरुद्ध
ऽ डॉ. टाइटसः ‘इंडियन इस्लाम’, पृ. 29