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एकता का विघटन

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घृणा के गीत गाते हुए आए थे। परंतु वे घृणा का वह गीत गाकर और मार्ग में कुछ मंदिरों को आग लगाकर ही वापस नहीं लौटे। ऐसा होता तो यह वरदान माना जाता। वे ऐसे नकारात्मक परिणाम मात्र से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस्लाम का पौधा लगाते हुए एक सकारात्मक कार्य भी किया। इस पौधे का विकास भी उल्लेखनीय है। यह ग्रीष्म में रोपा गया कोई पौधा नहीं है। यह तो ओक (बांज) वृक्ष की तरह विशाल और सुदृढ़ है। उत्तरी भारत में इसका सार्वधिक सघन विकास हुआ है। एक के बाद हुए दूसरे हमले ने इसे अन्यत्र कही की भी अपेक्षा अपनी ‘गाद’ से अधिक भरा है और उन्होंने निष्ठान मालियों के तुल्य इसमें पानी देने का कार्य किया है। उत्तरी भारत में इसका विकास इतना सघन है कि हिंदू और बौद्ध अवशेष झाडि़यों के समान होकर रह गए हैं_ यहां तक कि सिखों की कुल्हाड़ी भी इस ओक (बांज) वृक्ष को काटकर नहीं गिरा सकी। निस्संदेह सिख उत्तरी भारत के राजनीतिक स्वामी हो गए, परंतु वे उत्तरी भारत को वह आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता पुनः प्रदान नहीं करा पाए जिससे वह ह्वेनसांग के पूर्व शेष भारत के साथ आबद्ध था। सिखों ने इसे भारत को वापस तो दिला दिया, परन्तु यह राजनीतिक तौर पर एलसास लौरेन के तुल्य अलग हो सकने वाला और सांस्कृतिक रूप से पराया-सा ही बना रहा और जहां तक शेष भारत का संबंध था, उससे दूर-सा ही रहा। वह कल्पनाहीन व्यक्ति ही होगा जो इन तथ्यों पर ध्यान नहीं देगा अथवा इनकी विद्यमानता में इस बात पर आग्रह करेगा कि पाकिस्तान से तात्पर्य एक अखंड क्षेत्र का दो भागों में बंट जाना है।

पाकिस्तान और हिंदुस्तान के बीच हिंदू कौन सी एकता देखते हैं? यदि यह भौगोलिक एकता है तो वह कोई एकता नहीं है। भौगोलिक एकता प्रकृति-पोषित एकता होती है। भौगोलिक एकता के आधार पर राष्ट्रीयता के निर्माण में यह अवश्य ही स्मरण रखना चाहिए कि यह ‘प्रकृति सुझाती है, मानव निपटाता है’ जैसा मामला है। यदि यह बाह्य बातों जैसे कि जीवन-संबंधी आदत और रिवाजों के मामले में हो, तो भी यह कोई एकता नहीं हैं। ऐसी एकता तो एक सांझे परिवेश का परिणाम होती है। यदि यह प्रशासनिक एकता है तो भी इसे एकता नहीं कहा जा सकता। बर्मा का उदाहरण सामने है। अराकान और तेनासरिम पर येंदाबू की संधि के तहत 1826 ई. में अधिकार किया गया, पेगू और मातजिन को 1852 में कब्जे में लिया गया, जबकि 1886 में ऊपरी बर्मा को कब्जे में लिया गया। भारत और बर्मा के बीच प्रशासनिक एकता 1926 में स्थापित हो गई थी। यह प्रशासनिक एकता एक सौ दस वर्ष से भी अधिक तक रही। 1937 में वह गांठ काट दी गई जिसने दोनों को बांधा था और किसी व्यक्ति ने एक आंसू तक नहीं गिराया। भारत और बर्मा के बीच एकता कम आधारभूत तो नहीं थी। एकता यदि स्थाई स्वरूपवाली होनी है तो उसका बंधुता पर आधारित होना आवश्यक है, जो सजातीयता की अनुभूति से प्रेरित हो। संक्षेप में, यह