60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अपनी अज्ञानतावश मुट्टòी पर अंग्रेजों की जगह हिंदुस्तानी फौजियों को ही
अपना असली दुश्मन समझ लिया। अंग्रेज अधिकारियों ने गदर को दबाने
के लिए इस दुश्मनी का भरपूर उपयोग किया। जब लॉर्ड डलहौजी को
इंग्लैंड में गुरखों की भरती का समाचार मिला तो उसने बहुत संतोष व्यक्त
किया और अपने एक दोस्त को लिखा कि विश्वासपूर्वक इस बात की
आशा की जा सकती है कि अवध के सिपाहियों के विरुद्ध तो वे दानवों
की तरह लड़ेंगे_ और गदर के बाद हिंदुस्तानी फौज के सेनापति जनरल
मेस फील्ड ने सिखों के बारे में कहा कि यह इसलिए नहीं कि सिख हमसे
प्यार करते थे, बल्कि इसलिए कि वे हिन्दुस्तान से नफरत करते थे और
बंगाल आर्मी से नफरत करते थे। बजाए इसके कि सिख अपनी आजादी के
लिए दोबारा लड़ते, वे हमारे स्तर तक आ गए थे। वे बदला लेना चाहते थे
और हिंदुस्तानी शहरों को लूटकर अमीर बनना चाहते थे। वे महज दैनिक
वेतन-भत्तों से आकृष्ट नहीं हुए थे, वे तो जी-भर कर लूट-मार करने और
अपने दुश्मनों का सिर कलम करने के लिए भरती हुए थे। संक्षेप में इस
तरह हमें रणजीत सिंह की पुरानी खालसा फौज की एकता और साझे हितों
की भावना से लाभ हुआ, और जब तक उनके पुराने दुश्मनों के विरुद्ध
उनकी सेवाओं का लाभ उठाया जाता रहेगा, तब तक सिख हमारे साथ
जरूर ही बंधे रहेंगे।
फ्इस तरह स्थापित संबंध वास्तव में कहीं ज्यादा समय तक चले।
गदर के दौरान गुरखों और सिखों ने जो सेवाएं कीं, उन्हें भुलाया नहीं गया
और तभी से पंजाब और नेपाल को भारतीय फौज में सम्मानजनक स्थान
मिला हुआ है।य्
श्री चौधरी का यह कथन ठीक है कि यह 1857 का गदर ही था जिसके कारण हिंदुस्तानी फौज में उत्तर-पश्चिम के लोगों की बहुतायत हुई है और इस पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती। श्री चौधरी की यह राय भी निर्विवाद है कि उत्तर-पश्चिम के लोगों की बहुतायत उनके लड़ाकू गुणों की श्रेष्ठता के कारण नहीं है, जैसा कि उनके द्वारा एकत्र नीचे दिए गए आंकड़ों से भी स्पष्ट होता है कि गदर से पहले और गदर के बाद हिंदुस्तानी पैदल फौज के गठन का स्वरूप क्या था।