5. रक्षा व्यवस्था में कमजोरी - Page 70

रक्षा-व्यवस्था में कमजोरी

हिंदुस्तानी पैदल फौज के गठन में परिवर्तन

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विभिन्न भागों के लोगों का प्रतिशत

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1893
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1919
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48
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47
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15
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23
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12
5-5
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1-7
3

इन आंकड़ों से पता चलता है कि सन् 1856 में, गदर से एक साल पहले तक हिंदुस्तानी फौजों में उत्तर-पश्चिम के लोगों की संख्या नहीं के बराबर थी। परंतु गदर के एक साल बाद सन 1858 में उन्हें सेना में बहुत प्रमुख स्थान मिल गया, जिसे फिर कभी धक्का नहीं लगा।

इस तरह यह देखा जा सकता है कि एक सिद्धांत के नाते जब पहली बार 1879 में लड़ाकू जातियों में भेद किया गया, जिसे बाद में लॉर्ड रॉबर्ट्सऽ ने गंभीर विचार योग्य बताया, और जिसे अंततः लॉर्ड किचनर ने हिंदुस्तानी फौज में भर्ती के सिद्धांत के रूप में अपना लिया, उससे इस बात का कोई संबंध नहीं कि हिंदुस्तानी फौज में उत्तर-पश्चिम के लोगों को इतना प्रमुख स्थान मिलने की शुरुआत कैसे हुई। निस्संदेह इस बात के महत्वपूर्ण परिणाम निकले कि भाग्यवश उत्तर-पश्चिम के लोगों को लड़ाकू जाति का घोषित कर दिया गया और भारत के अधिकांश लोगों का दुर्भाग्य

ऽ अपनी ‘फोर्टीवन ईयर्स’ में उसने लिखा - हरेक सर्दी के मौसम में यह पता लगाने के लिए मैं लंबे-लंबे

दौरे करता था कि मद्रास आर्मी के जवानों की जरूरतें और क्षमताएं क्या हैं। मैंने यह पता लगाने के

लिए बड़ी मेहनत की कि उनमें ऐसे कौन से लड़ाकू गुण हैं जो उन्हें पिछली और इस शताब्दी के

शुरू में होने वाले युद्धों में अलग से विशिष्ट बनाते हैं, और विवश होकर मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचना

पड़ा कि उनसे प्राचीन सैनिक भावना भर चुकी है, उसी तरह जैसे कि वह बंगाल के आम हिंदुस्तानी

और बम्बई के मराठा में भर चुकी है। और उन्हें बिना खतरे के अन्य लड़ाकू जातियों के विरुद्ध या

दक्षिणी भारत की सीमा के बाहर लड़ाई में नहीं भेजा जा सकता।