5. रक्षा व्यवस्था में कमजोरी - Page 71

62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

कि उन्हें गैर-लड़ाकू जातियां घोषित कर दिया गया। फौज में नियमित रूप से नौकरी मिलने के कारण उत्तर-पश्चिम के लोगों ने समझ लिया कि फौज की नौकरी उनकी जीविका है जिसमें उन्हें सुरक्षा भी मिली हुई है, और वह उनका पेशा भी है जो भारत के शेष भागों के लोगों को उपलब्ध नहीं था। इसलिए उत्तर-पश्चिम के लोगों की फौज में भरती होने वालों की भारी संख्या इसके सिवाए और कुछ नहीं दिखाती कि ब्रिटिश सरकार की नीति के कारण फौज की नौकरी उनके लिए जीविका बन गई थी और यदि भारत के अन्य भागों के लोग अपने आप फौज में भरती होने नहीं आते तो इसका कारण यह है कि सरकार उन्हें फौज में भरती ही नहीं करती थी। लोग चाहे पसंद करें या न करें, पर वे अपना पुश्तैनी धंधा अपनाते हैं। जब लोग कोई नया धंधा नहीं अपनाते तो उसका मतलब जरूरी तौर पर यह नहीं होता कि वे नया धंधा अपनाने के योग्य ही नहीं हैं। इसका तात्पर्य केवल यह होता है कि यह उनके पुरखों का धंधा नहीं है।

लड़ाकू और गैर-लड़ाकू जातियों के बीच का विभाजन पूर्णतः मनमाने और कृत्रिम ढंग से किया गया है। यह हिंदुओं की जाति-प्रथा जैसा ही मूर्खतापूर्ण है, जिसमें योग्यता के बजाय जन्म के आधार पर मान्यता मिलती है। एक समय था जब सरकार इस बात पर जोर देती थी कि उसने जो विभेद किया है, वह वास्तविक विभेद है और लड़ाकू गुणों के आधार पर इसका तात्पर्य होता है लड़ाकूपन की अमुक मात्रा। वास्तव में इसी तर्क के आधार पर वह भारत के उत्तर-पश्चिम से ज्यादा लोगों के भरती करने को न्यायोचित ठहराते थे। पर इस विभेद का लड़ाकू गुणों से कोई मतलब नहीं था जो अब भारत के पिछले प्रधान सेनापति सर फिलिप चेटवीडऽ ने भी स्वीकार कर लिया है। भारतीय सेना की संरचना के बारे में लंदन से एक प्रसारण में उन्होंने यह समझाने की चेष्टा की कि पंजाब से बड़े अनुपात में भरती का यह अर्थ नहीं कि प्रायद्वीप के अन्य लोगों में लड़ाकू गुण होते ही नहीं। सर फिलिप चेटवीड ने बताया कि हिंदुस्तानी फौज में उत्तर के लोग बड़ी संख्या में जिस कारण से भरती किए जाते थे वह था जलवायु का, क्योंकि दक्षिण के लोग उत्तर भारत की कड़ाकेदार सर्दी और झुलसानेवाली गर्मी सहन नहीं कर सकते। कोई भी जाति ऐसी नहीं हो सकती जिसमें स्थाई तौर से लड़ाकू गुण न हों। लड़ाकूपन की भावना कोई जन्मजात सहज वृत्ति नहीं होती। यह तो प्रशिक्षण से आती है और प्रशिक्षित किसी भी व्यक्ति को किया जा सकता है।

परंतु इस धारणा के अतिरिक्त भी, हिंदुस्तान में काफी बड़ी संख्या में लड़ाकू गुणों वाले लोग हैं जो विशेष प्रशिक्षण से तैयार किए जाने वाले लोगों से अलग

ऽ इंडियन सोशल रिफार्मर, 27 जनवरी, 1940