रक्षा-व्यवस्था में कमजोरी
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हैं। इनमें सिख भी हैं, जिसके लड़ाकू गुणों के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। फिर राजपूत हैं जिन्हें अब भी लड़ाकू जातियों के वर्ग में शामिल किया जाता है। इनके अतिरिक्त मराठे हैं, जिन्होंने पिछले यूरोपियन युद्ध में एक लड़ाकू जाति के रूप में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी थी। फौजी उद्देश्यों की दृष्टि से मद्रास प्रेसीडेंसी के लोगों पर भी भरोसा किया जा सकता है। भारत में एक समय प्रधान सेनापति रहे जनरल फ्रेडरिक पी. हाएनेस ने फौजी के रूप में मद्रासियों के बारे में यह शब्द कहे थेः
फ्यह कहना एक आदत सी बन गई है कि मद्रास फौज ऐसे जवानों से बनी
है जो बंगाल फौज के जवानों से शारीरिक दृष्टि से हीन है परन्तु और यदि
केवल कद-काठी को देखा जाए तो यह बात सच है। यह भी कहा जाता
है कि परिस्थितियों के कारण मद्रास फौज में वह लड़ाकू भावना और गुण
अब नहीं पाए जाते जो असली फौजी में होने चाहिए। मैं उक्त धारणाओं
और ऐसी सभी धारणाओं को अस्वीकार करता हूं जो मद्रास के फौजियों को
अपेक्षाकृत घटिया बताती हैं। यह सच है कि हाल के वर्षों में उन्होंने कोई
लड़ाई नहीं देखी, क्योंकि सफरमैना के अतिरिक्त उन्हें विशेष रूप से युद्ध
के काम से अलग रखा गया है। मैं एक क्षण के लिए भी यह स्वीकार नहीं
कर सकता कि कोई ऐसी बात हुई जिससे पता चले कि मद्रासी सिपाही
एक लड़ाकू जवान के रूप में घटिया होता है। ऐतिहासिक तथ्य तो हमें
इसकी उल्टी बात बताते हैं। कवायद के प्रशिक्षण और अनुशासन में मद्रासी
सिपाही किसी से घटिया नहीं हैं। जहां तक स्वास्थ्य की बात है, जैसा कि
रिपोर्टों से पता चलता है, वह तुलनात्मक दृष्टि से अपने पड़ोसियों से कम
नहीं हैं। उनके सफरमैनों और साथियों ने खैबर में यह दिखा दिया है, और
उनके सफरमैन भी उसी जाति के हैं जिस जाति के कि सिपाही हैं।य्
इसलिए हिंदुस्तान को इस बारे में कोई आशंका नहीं होनी चाहिए कि अपने लोगों में से उसे लड़ाकू फौज के लिए पर्याप्त लोग नहीं मिलेंगे। पाकिस्तान के अलग होने से वह उस दृष्टि से कमजोर नहीं होगा।
साइमन कमीशन ने हिंदुस्तानी फौज के तीन गुणों की ओर ध्यान दिलाया, जो उसे हिंदुस्तानी फौज की अलग विशेषता और विशिष्टता लगती थी। उसने कहा था कि हिंदुस्तानी फौज के दो तरह के काम हैं। एक तो अफगानिस्तान की सीमा से लगते भारतीय इलाके के आजाद कबायलियों को निचले मैदानी इलाकों में रहने वाले शांतिप्रिय