5. रक्षा व्यवस्था में कमजोरी - Page 73

64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

नागरिकों पर हमला करने से रोकना। दूसरा, उन देशों के आक्रमणों से हिंदुस्तान की रक्षा करना जो इन अनिर्धारित सीमाओं के पीछे या उसके और पार के हैं। कमीशन ने इस जानकारी पर ध्यान दिया कि 1850 से 1922 के बीच आजाद कबायलियों के विरुद्ध 72 बार कार्रवाई की गई, अर्थात् औसतन साल में एक बार। कमीशन ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि इस अनिर्धारित सीमा के पीछे के तथा उसके और पार देशों में वह रास्ता है, जहां से युगों-युगों से हिंदुस्तान की प्रादेशिक अखंडता पर

खतरा मंडराता रहा है। इस हिस्से में ऐसे देश में जो कमीशन के अनुसार लीग ऑफ नेशंस के सदस्य नहीं हैं। और इसलिए अब वे पहले की अपेक्षा हिंदुस्तान के लिए अधिक बड़ा खतरा बन गए हैं। कमीशन बराबर इस बात पर जोर देता रहा कि ये दो तथ्य हिंदुस्तान की सैनिक सुरक्षा की समस्या का विशिष्ट पहलू हैं। और जहां तक इस समस्या के तात्कालिक महत्व और काबलियत का सवाल है, तो ब्रिटिश साम्राज्य में उससे मिलती-जुलती समस्या कहीं भी नहीं है जिसके कारण स्वायत्त शासन का विकास करने में ऐसी कठिनाई हो रही है जो तुलनात्मक रूप में अन्य स्वायत्तशासी उपनिवेशों के सामने नहीं आईं?

भारतीय सेना की एक दूसरी अनूठी विशिष्टता के बारे में कमीशन ने टिप्पणी कीः

फ्हिंदुस्तान में फौज की व्यवस्था और संगठन न केवल इसलिए किया जाता

है कि वह अपवाद-स्वरूप होने वाले आक्रमणों से रक्षा करे, बल्कि इसे

सारे देश में फैलाकर इसलिए भी रखा जाता है कि वह देश में शांति बनाए

रखे, या उसे पुनः बहाल करे। सभी देशों में... सामान्यतया फौज इस तरह

तैनात नहीं की जाती और न ही वह इस काम के लिए संगठित की जाती

है। किंतु भारत का मामला बिल्कुल अलग है। वर्ष में कई बार फौज का

प्रयोग भीतरी गड़बड़ी को रोकने के लिए किया जाता है और यदि जरूरी

हो तो इसे कुचल डालने के लिए भी किया जाता है। पुलिस अपने वर्तमान

रूप में यद्यपि बड़े अच्छे ढंग से संगठित है, परंतु उससे यह आशा नहीं

की जा सकती कि धर्मांधता के कारण जब कोई भीड़ अचानक हिंसा पर

उतारू हो जाए तो वह उसका सामना कर सके। इसलिए भारत में पुलिस

और फौज दोनों इस बात को अच्छी तरह समझती हैं, और उससे भी बढ़कर

जनता समझती है, कि सैनिकों को बुलाया जा सकता है। आंतरिक व्यवस्था

बनाए रखने अथवा बहाल करने के लिए सेना का प्रयोग घटने की बजाए

बढ़ रहा था और इन परिस्थितियों में वस्तुतः सर्वदा ब्रिटिश टुकडि़यों के

लिए अनुरोध किया जाता था। वास्तव में, शताब्दी के अंतिम चतुर्थांश में इन