5. रक्षा व्यवस्था में कमजोरी - Page 88

रक्षा-व्यवस्था में कमजोरी

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इस बारे में कुछ जानते थे। परंतु यदि यह अनुपात 50 प्रतिशत भी हो तो भी इतना अधिक है कि हिंदुओं के लिए खतरे की घंटी है। यदि यह सच है तो यह गदर के बाद अपनाई गई ब्रिटिश फौजी नीति के सुस्थापित सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।

गदर के बाद ब्रिटिश सरकार ने हिंदुस्तानी फौज के संगठनात्मक ढांचे के बारे में जांच के दो आदेश दिए थे। पहली जांच पील कमीशन ने की जिसकी नियुक्ति 1859 में की गई थी। दूसरी जांच स्पेशल आर्मी कमेटी नामक एक कमेटी ने की, जिसकी नियुक्ति 1879 में की गई और जिसका उल्लेख पहले ही किया जा चुका है।

पील कमीशन ने जिस मुख्य प्रश्न की जांच की, वह था बंगाल फौज की कमजोरी का पता लगाना जिसके कारण 1857 का गदर हुआ। कमीशन को एक के बाद एक साक्ष्य देने वालों ने बताया कि जिस बंगाल फौज ने गदर किया, उसकी कमजोरी निम्नलिखित थीः

फ्नियमित फौज के सिपाही संयोगवश घुलमिल गए। फौजी कंपनियां वर्ग

या वर्ण के हिसाब से अलग-अलग नहीं थी.............(फौजी) लाइन्स में

हिंदू और मुसलमान, सिख और पूरविया सब एक साथ मिलकर रहते थे,

जिसमें वे सब कुछ हद तक अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को भूलकर एक ही

भावना से प्रेरित होने लगे।य्ऽ

इसलिए सर जॉन लॉरेंस ने सुझाव दिया कि हिंदुस्तानी फौज की टुकडि़यां बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाए कि उनकी विशिष्टता बनी रहे, जो इतनी महत्वपूर्ण या मूल्यवान है, और जब तक यह विशिष्टता बनी रहेगी, एक देश का मुसलमान दूसरे देश के मुसलमान से नफरत करता रहेगा, डरता रहेगा या उसे नापसंद करता रहेगा। भविष्य में फौजी टुकडि़यां प्रांतीय आधार पर बननी चाहिएं, जिनमें भौगोलिक सीमाओं को ध्यान में रखा जाए और जिनमें उनके अंतर और प्रतिद्वंद्विता की भावना जोरदार ढंग से नजर आए। हमें एक प्रांत की ही तमाम जातियों को, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान, एक ही रेजीमेंट में रखना चाहिए और किसी और प्रांत वाले को उस रेजीमेंट में नहीं रखना चाहिए और इस तरह अलग-अलग रेजीमेंट बनाकर हमें उन्हें वैसा ही रखना चाहिए, जो जरूरत पड़ने पर काम आए... इस तरह सुझाई गई प्रणाली में दो बड़ी बुराइयों को दूर किया जा सकेगा। पहली, सारी देसी फौज में समुदाय की भावना_ और दूसरे, अन्य प्रांतों की जातियों से मिलने और अन्य प्रांतों की यात्रा करने से होने वाली खुराफाती राजनीतिक गतिविधियां और षड्यंत्र। [†]

ऽ मेमन और लावेट, दि आर्मीज ऑफ इंडिया, पृ. 84-85, चौधरी द्वारा उद्धृत।

† जैसा कि चौधरी ने उद्धृत किया।