80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
पील कमीशन के सामने बहुत से सैनिकों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया और उसने इसे हिंदुस्तानी फौज की नीति का सिद्धांत मानने की सिफारिश की। इस सिद्धांत को वर्ग-संरचना (क्लास-कंपोजीशन) के सिद्धांत के नाम से जाना गया।
1879 में नियुक्त स्पेशल आर्मी कमेटी के सम्मुख एक बिलकुल ही भिन्न समस्या थी। कमेटी ने जो प्रश्नावली जारी की, उससे यह समस्या अच्छी तरह प्रकट हो जाती है। प्रश्नावली में एक प्रश्न निम्नलिखित थाः
फ्यदि साम्राज्य की रक्षा के लिए हिंदुस्तानी फौज के कुशल और उपलब्ध
रिजर्व सैनिकों को आवश्यक समझा जाता है, तो क्या इसे देश के ऐसे भागों
से भर्ती और पोषित नहीं करना चाहिए जहां से सर्वोत्तम सिपाही मिलते हैं,
बजाए इसके कि उन्हें सबसे कमजोर और सबसे कम लड़ाकू जातियों से
भर्ती किया जाए। निःसंदेह इस बात पर आवश्यक ध्यान जरूर दिया जाना
चाहिए कि किसी एक विशेष जाति को या धार्मिक गु्रप को बहुत अधिक
ताकत या वर्चस्व प्राप्त नहीं और साम्राज्य की सुरक्षा का भी उचित ध्यान
रखा जाए।य्
स्पष्टतः इस प्रश्न का मुख्य भाग यह है कि यह जरूरी समझा गया है कि किसी एक विशेष जाति या धार्मिक गु्रप को बहुत अधिक ताकत या वर्चस्व नहीं मिलना चाहिए। इस प्रश्न पर सरकारी अफसरों की यही सर्वसम्मत राय कमेटी के सम्मुख व्यक्त की गई थी।
बंबई फौज के कमांडर-इन-चीफ ले. जनरल एच.जे. वारेस ने कहाः
फ्मेरे विचार से यह संभव नहीं है कि हिंदुस्तानी फौज के रिजर्व सैनिकों की
हिंदुस्तान के केवल उसी भाग में से भर्ती की जाए जहां से सर्वोत्तम सिपाही
मिलते हैं, अन्यथा इन भागों की जातियों और धार्मिक समुदायों को जरूरत
से अधिक ताकत और वर्चस्व मिल जाएगा।
कमांडर-इन-चीफ सर फ्रेडरिक पी. हेन्स ने कहाः
फ्जाति, भाषा और निहित स्वार्थों की दृष्टि से बिल्कुल भिन्न और संख्या
में भी अधिक बंगाल फौज को प्रतिसंतुलित करने के लिए इन फौजों
(मद्रास और बंबई फौज) को बनाए रखना मेरी राय में अत्यंत नीतिसम्मत
और बुद्धिमत्तापूर्ण होगा_ और मैं किसी भी दशा में उनकी संख्या कम नहीं
करूंगा, जिससे कि एक ऐसा रिजर्व बनाया जा सके जिसमें सबसे अधिक
कुशल लड़ाकू ऐसे सिपाही हों (जिन्हें लेना संभव हो)। यदि इसका यह