82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
वह सिद्धांत, जो विश्वयुद्ध से पहले इतना अधिक सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया और इतनी अधिक कड़ाई से लागू किया गया, उसे विश्वयुद्ध के बाद इतने अनौपचारिक ढंग से बिना किसी पछतावे के चुपके से तिरस्कृत कर दिया गया, इसका कोई कारण आसानी से समझ में नहीं आता। ऐसा क्या कारण हुआ कि अंग्रेज हिंदुस्तानी फौज में मुसलमानों की इतनी प्रमुखता को स्वीकार करने लगे? इसकी दो व्याख्याएं संभव लगती हैं। एक तो यह कि विश्वयुद्ध में मुसलमानों ने यह साबित कर दिया कि वे हिंदुओं के मुकाबले बेहतर फौजी होते हैं। दूसरी व्याख्या यह है कि अंग्रेजों ने यह नियम इसलिए तोड़ा और फौज में मुसलमानों को इतनी प्रमुखता इसलिए दी कि वे अंग्रेजों के हाथों से राजनीतिक सत्ता छीनने वाली हिंदू आंदोलनकारी शक्तियों के प्रति संतुलन बनाना चाहते थे।
चाहे कोई भी व्याख्या हो, उल्लिखित सर्वेक्षण से दो तथ्य स्पष्ट उभरकर आते हैं। एक तो यह कि हिंदुस्तानी फौज में मुसलमानों की बहुलता है। दूसरा यह कि जिन मुसलमानों की बहुलता है, वे पंजाब और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के हैं। हिंदुस्तानी फौज की इस संरचना का मतलब यह हुआ कि केवल पंजाब और पश्चिमी सीमा प्रांत के मुसलमानों को ही हिंदुस्तान पर बाहर से होने वाले हमलों से रक्षा करने का काम सौंपा गया है। यह तथ्य इतना अधिक स्पष्ट होकर उभरा है कि पंजाब और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के मुसलमान इसे अच्छी तरह जानते हैं कि अंग्रेजों ने उन्हें यह गौरवशाली स्थान दिया है, यद्यपि इसका कारण सिर्फ अंग्रेज ही जानते हैं। अक्सर उन्हें यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे हिंदुस्तान के द्वारपाल हैं। हिंदुओं को इस महत्वपूर्ण तथ्य को अवश्य ध्यान में रखते हुए ही भारत की रक्षा-समस्या पर विचार करना चाहिए।
हिंदू इन द्वारपालों पर कितना निर्भर कर सकते हैं कि दरवाजे पर जमें रहेंगे और हिंदुस्तान की स्वतंत्रता और आजादी की रक्षा करेंगे? इस प्रश्न का उत्तर निश्चित रूप से इस बात पर निर्भर करेगा कि दरवाजे को खोलने के लिए ताकत कौन लगा सकता है। यह तो बिल्कुल स्पष्ट है कि केवल दो देश ऐसे हैं जो हिंदुस्तान की उत्तर-पश्चिमी सीमा की ओर से प्रवेश करना चाहेंगे - रूस या अफगानिस्तान, क्योंकि इन दोनों देशों की सीमाएं हिंदुस्तान की सीमाओं को छूती हैं। इनमें से कौन और कब हमला करेगा, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। यदि यह हमला रूस की ओर से हुआ तो यह आशा की जा सकती है कि भारत के ये द्वारपाल बड़ी मजबूती से और वफादारी से द्वार की रक्षा करेंगे और हमलावर को रोक देंगे। यदि अफगान अकेले अपने बूते पर या अन्य मुस्लिम देशों के साथ मिलकर हमला करे, तब ये द्वारपाल हमलावर को रोकेंगे या उन्हें भीतर आने देंगे? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसकी