5. रक्षा व्यवस्था में कमजोरी - Page 92

रक्षा-व्यवस्था में कमजोरी

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कोई भी हिंदू उपेक्षा नहीं कर सकता। और चूंकि यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण निर्णायक विषय है, और अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णायक प्रश्न, इसलिए हर हिंदू को इस बारे में पूरी तरह आश्वस्त होना चाहिए।

यह कहा जा सकता है कि अफगानिस्तान भारत पर हमला करने की बात कभी नहीं सोचेगा, परंतु किसी सिद्धांत की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है जब वह बुरी से बुरी स्थिति का भी सामना कर सके। पंजाबी और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के मुसलमानों की फौज की वफादारी और विश्वसनीयता की जांच तभी की जा सकती है, जब यह पता चले कि अफगानों के हमले की दशा में वे क्या करेंगे। यदि हम आधारभूत सुरक्षा चाहते हैं, तो इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना ही होगा कि अफगान हमले की दशा में क्या वे अपनी जन्मभूमि की रक्षा को महत्व देंगे या मजहब के नाम पर बह जाएंगे। यह मान लेना सुरक्षित नहीं है कि जब एक हिंदुस्तान को अंग्रेजों का संरक्षण मिला हुआ है, तब तक हमें इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। इस प्रकार की पलायनवादी वृत्ति अपनाकर इन परेशान करने वाले कठिन प्रश्नों का उत्तर देने से बचना सुरक्षित नहीं है। स्वयं को संतुष्ट करने वाले इस दृष्टिकोण को कभी क्षमा नहीं किया जा सकता। पहली बात तो यह है कि पिछले विश्वयुद्ध ने दिखा दिया है कि ऐसी स्थिति आ सकती है जब ग्रेट ब्रिटेन उस समय हिंदुस्तान की रक्षा करने की स्थिति में न हो जबकि उसे अपनी रक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत हो। दूसरी बात, किसी संस्था की योग्यता स्वाभाविक परिस्थितियों में आंकी जानी चाहिए न कि कृत्रिम परिस्थितियों में। ब्रिटिश नियंत्रण में हिंदुस्तानी सिपाही का बर्ताव कृत्रिम होता है। उसका बर्ताव उस समय स्वाभाविक होता है जब वह हिंदुस्तानी नियंत्रण में होता है। ब्रिटेन का नियंत्रण इस बात की अनुमति नहीं देता कि फौज के सिपाही अपनी स्वाभाविक इच्छाओं और स्वाभाविक सहानुभूति को प्रकट कर सकें। इसीलिए फौज के सिपाही इतना अच्छा बर्ताव करते हैं। किंतु यह एक कृत्रिम परिस्थिति है, स्वाभाविक नहीं। हिंदुस्तानी फौज ब्रिटिश नियंत्रण में अच्छा बर्ताव करती है, परंतु यह इस बात की गारंटी नहीं कि हिंदुस्तानी नियंत्रण में भी उसका बर्ताव उतना ही अच्छा होगा। एक हिंदू को इस बात के प्रति बहुत संतुष्ट होना चाहिए कि फौज ब्रिटिश नियंत्रण हट जाने के बाद भी उतना अच्छा बर्ताव करेगी।

यह प्रश्न कि हिंदुस्तान पर अफगान हमले के समय पंजाबियों और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के मुसलमानों की यह सेना कैसा बर्ताव करेगी, अत्यंत प्रासंगिक और निर्णायक महत्व का है और चाहे यह कितना ही नाखुशगवार क्यों न हो, हमें इसका सामना करना ही चाहिए।

कोई व्यक्ति पूछ सकता है कि हम यह मानकर ही क्यों चलें कि फौज में