5. रक्षा व्यवस्था में कमजोरी - Page 93

84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

मुसलमानों का इतना अधिक अनुपात बना ही रहेगा, क्या इसे कम नहीं किया जा सकता है? जो इस अनुपात को कम कर सकते हैं, और इस दिशा में वे जो कोशिश कर सकते हैं, उन्हें करने देनी चाहिए। परंतु जहां तक नजर आता है, इसे कम नहीं किया जा सकता। इसके उलट, मुझे तो लगता है कि जब संशोधन होगा तो मुस्लिम अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के नाम पर संशोधन करते समय संविधान में भी इसे शामिल कर लिया जाएगा। यह निश्चित है कि मुसलमान यह मांग जरूर उठाएंगे और किसी न किसी तरह हिंदुओं के मुकाबले मुसलमानों को सदैव सफलता मिलती है। इसलिए हमें यह मानकर ही चलना चाहिए कि हिंदुस्तानी फौज की संरचना वैसी ही बनी रहेगी जैसी आज है। जब आधार वही बना रहेगा तो हमारा प्रश्न भी वैसे ही बना रहेगा कि क्या हिंदू लोग अफगानिस्तान के आक्रमण के समय ऐसी फौज पर निर्भर रह सकते हैं? केवल तथाकथित राष्ट्रवादी इस प्रश्न का उत्तर हां में देंगे। परंतु यथार्थवादियों में सबसे साहसी लोग भी इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले अवश्य सोचेंगे। यथार्थवादी इस बात को अवश्य नोट करेंगे कि मुसलमान हिंदुओं को काफिर समझते हैं_ जिनकी रक्षा करने की जगह उनका उन्मूलन कर देना चाहिए। एक यथार्थवादी को इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि मुसलमान यूरोपियों को अपने से श्रेष्ठ मान लेता है, परंतु हिंदुओं को अपने से घटिया मानकर चलता है। यह बात संदेहजनक है कि मुसलमानों की कोई रेजीमेंट आखिर तक हिंदु अफसरों के मातहत काम करेगी और उन्हें स्वीकार करेगी। एक यथार्थवादी को यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि सभी मुसलमानों में उत्तर-पश्चिम का मुसलमान हिंदुओं से अपने संबंधों के कारण सबसे कम प्रभावित होता है। एक यथार्थवादी को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पंजाबी मुसलमान सर्व-इस्लामवाद के प्रचार से बहुत अधिक प्रभावित होता है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए, इस बारे में कोई संदेह नहीं रहता कि बेहद साहसी हिंदू ही यह कहने की हिम्मत करेगा कि मुस्लिम देशों के हमले की दशा में हिंदुस्तानी फौज के मुसलमानों के हमलावारों से मिल जाने का कोई खतरा नहीं। यहां तक कि थियोडोर मारिसनऽ ने भी 1899 में यह विचार प्रकट कियाः-

फ्मुसलमान (जो देश के लोगों में सबसे अधिक आक्रामक और लड़ाकू हैं)

की यह राय है कि अकेले वे ही इसमें सक्षम हैं कि आजाद हिंदुस्तान की

सरकार की स्थापना न होने दें। यदि एक स्वायत्तशासी भारत पर अफगान

उत्तर से हमला करेंगे तो बजाए इसके कि वे हिंदुओं और सिखों के साथ

मिलकर उनका मुकाबला करें, अपने स्वजनों और समान धर्मावलंबी अफगानों

के झंडे तले आ जाएंगे।य्

ऽ इंपीरियल रूल इन इंडिया, पृ. 5