5. रक्षा व्यवस्था में कमजोरी - Page 94

रक्षा-व्यवस्था में कमजोरी

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और जब हम यह देखते हैं कि खिलाफत आंदोलन चलाने वाले हिंदुस्तानी मुसलमानों ने वास्तव में अफगानिस्तान के अमीर को हिंदुस्तान पर हमला करने का न्यौता दिया था तो सर थियोडोर मारिसन का विचार और अधिक ठोस लगता है और अनिश्चितता समाप्त हो जाती है।

हिंदुओं को केवल इसी प्रश्न पर ध्यान नहीं देना होगा कि पंजाब और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के मुसलमानों से बनी यह सेना अफगानिस्तान के हमले के समय कैसा व्यवहार करेगी। एक और उतने ही महत्वपूर्ण सवाल पर भी हिंदुओं को विचार करना होगा कि क्या हिंदुस्तान की सरकार को दस बात की आजादी होगी कि अफगानों की वफादारी की बात को भूलते हुए हिंदुस्तानी फौज का इस्तेमाल अफगान हमलावरों के विरुद्ध करें? इस संबंध में मुस्लिम लीग के दृष्टिकोण को भी ध्यान में रखना होगा। लीन का दृष्टिकोण यह है कि हिंदुस्तानी फौज का इस्तेमाल मुस्लिम देशों के विरुद्ध नहीं किया जाएगा। इसमें कोई नई बात नहीं है। लीग के आने से पहले, खिलाफत कमेटी ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था। इसके अतिरिक्त यह सवाल भी बना रहता है कि भविष्य में मुसलमान इसे कहां तक अपनी आस्थ का प्रश्न नहीं बनाएंगे। अंग्रेज सरकार के मुकाबले लीग को यदि इस दिशा में सफलता नहीं मिली तो इसका यह मतलब नहीं कि लीग को हिंदुस्तान की सरकार के विरुद्ध भी सफलता नहीं मिलेगी। संभावनाएं इस बात की हैं कि लीग को इसमें सफलता मिलेगी, क्योंकि हिंदुओं के दृष्टिकोण से यह बात भले बहुत गैर-देशभक्तपूर्ण हो, यह मुसलमानों की भावनाओं के बिलकुल अनुरूप है, और लीग को इसके बारे में हिंदुस्तान के मुसलमानों का आम समर्थन मिल जाएगा। यदि मुस्लिम लीग को हिंदुस्तान की अन्य फौजों के इस्तेमाल पर यह सीमा लगाने में सफलता मिल जाती है तो फिर हिंदुओं की क्या दशा हो जाएगी? यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर हिंदुओं को विचार करना ही चाहिए।

यदि हिंदुस्तान राजनीतिक दृष्टि से एक देश बना रहता है, और पाकिस्तान द्वारा निर्मित द्वि-राष्ट्र वाली मनोवृत्ति उस पर थोपी जाती रहती है, तो जहां तक रक्षा का प्रश्न है, हिंदुओं को लगेगा कि एक तरफ कुआं है और दूसरी तरफ खाई। फौज तो होगी, पर लीग की आपत्ति के कारण अपनी इच्छा से उसका उपयोग नहीं किया जा सकेगा। यदि इस्तेमाल भी किया जाएगा तो भी संदेहास्पद वफादारी के कारण उस पर निर्भर नहीं रहा जा सकेगा। यह स्थिति जितनी दयनीय है, उतनी ही संदिग्ध और खतरनाक भी। यदि फौज में उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब के मुसलमानों का वर्चस्व बना रहा तो हिंदुओं को इसका खर्च तो उठाना पड़ेगा, परंतु वे उसका इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे, और यदि इस्तेमाल किया भी तो उस पर निर्भर रहना खतरे से खाली नहीं होगा। यदि लीग का यह विचार लागू कर दिया गया तो उन सैनिक