3. तुच्छ चालें - Page 103

88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की संख्या निश्चित नहीं की गई है। ऐसा विचार है कि बंगाल विधानसभा

में दलित वर्गों के लिए दस से कम संख्या नहीं होनी चाहिए।

अभी यह अंतिम रूप से तय नहीं किया गया है कि सभी प्रांतों में विशेष

दलित वर्ग निर्वाचन-क्षेत्रों में कौन से लोग और मतदाता कैसे मतदान के

अधिकारी होंगे। इसका निश्चय मताधिकार समिति की रिपोर्ट में उल्लिखित

नियमों के अनुसार होगा। कुछ उत्तरी प्रांतों के विषय में संशोधन किया जा

सकता है, जहां अस्पृश्यता के निर्धारित मापदंड प्रांत की अवस्था को देखते

हुए परिभाषा के प्रतिकूल पाई जाएगी।

अंग्रेज सरकार यह नहीं मानती कि अस्पृश्यों के लिए नियत इन विशेष

निर्वाचन-क्षेत्रों की किसी सीमित अवधि के बाद भी आवश्यकता पड़ेगी।

उसका विचार है कि यदि पहले भी नहीं, तो मतसूचियों के संशोधन की

परिच्छेद 6 में वर्णित व्यवस्था के अनुसार 20 साल बाद तो यह व्यवस्था

समाप्त हो जाएगी।

VIII

श्री गांधी को अहसास हुआ कि उनकी धमकी का असर नहीं हो रहा है। उन्हें इसकी भी परवाह नहीं रही कि प्रधानमंत्री से पंच-निर्णय करने की मांग पर उन्होंने भी हस्ताक्षर किए थे और इस नाते वह पंच-निर्णय को मानने को बाध्य थे। उन्होंने प्रधानमंत्री के किए-कराए पर पानी फेरना शुरू कर दिया। पहले तो उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक फैसले की शर्तों में संशोधन किया जाए। उसी के अनुसार उन्होंने प्रधानमंत्री को निम्नलिखित पत्र लिखा -

यर्वदा केंद्रीय जेल,

अगस्त 18, 1932

फ्प्रिय मित्र,

इसमें कोई शक नहीं कि दलितों के प्रतिनिधित्व के बारे में सर सैमुअल

होर ने मेरा 11 मार्च का पत्र आपको और आपके मंत्रिमंडल को दिखा दिया

होगा। यह पत्र उसी का एक अंश माना जाए और उसी के साथ पढ़ा जाए।

मैंने अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व के विषय में ब्रिटिश सरकार का

निर्णय पढ़ा और एक तरफ रख दिया। जैसाकि मैंने श्री सैमुअल होर को पत्र

लिखा था और दिनांक 13 नवंबर, 1931 को सेंट जेम्स पैलेस में गोलमेज