3. तुच्छ चालें - Page 109

94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आप उन दलित वर्गों के प्रति कितनी भी सहानुभूति क्यों न रखते हों परंतु आप

ऐसे जीवंत और धार्मिक महत्व के प्रश्न पर सही फैसला नहीं ले सकते।

मैं दलित वर्गों को उनके अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व देने के विरुद्ध

भी नहीं हूं। मैं तो जब तक वे हिंदू रहना चाहें तब तक उन्हें संवैधानिक

ढंग से पृथक करने के विरुद्ध हूं। वह भले ही सीमित रूप में क्यों न हों।

क्या आपको इस बात का अहसास है कि यदि आपका निर्णय लागू रहता

है और संविधान बन जाता है तो आप उन हिंदू समाज-सुधारकों के महान

कार्य में बाधा उपस्थित करेंगे जिन्होंने शोषित और दलितों का प्रत्येक क्षेत्र

में उत्थान करने का बीड़ा उठाया हुआ है।

इसलिए मैं विवश हूं और अनिच्छा से मैं उस फैसले पर (आमरण

अनशन) पर अडिग हूं जिसकी सूचना मैं आपको दे चुका हूं।

आपके पत्र से कुछ गलतफहमी हो सकती है। मैं कहना चाहूंगा कि

आपके फैसले के उस भाग से मैं सहमत नहीं हूं जिसमें दलित वर्गों को

हमसे अलग करने को कहा गया है। मुझे इसके साथ ही अन्य कुछ भागों

पर भी गंभीर आपत्ति है। मैं उन्हें भी आत्मोत्सर्ग का कारण नहीं समझता,

क्योंकि मेरी आत्मा ने मुझे केवल दलित वर्ग के बारे में झकझोरा है।

आपका विश्वसनीय मित्र

मो. क. गांधीय्

तदनुसार 20 सितंबर, 1932 को गांधी जी ने अस्पृश्यों को पृथक मतदान देने के विरुद्ध अपना फ्आमरण अनशनय् आरंभ किया। श्री प्यारे लाल ने अपनी पुस्तक फ्द एपिक फास्टय् में इस कथानक की सत्यता को चित्रात्मक रूप से प्रकाशित किया है। इच्छुक पाठक इसका संदर्भ देख सकते हैं। मैं उन्हें चुनौती देना चाहूंगा कि यह पुस्तक बासवेल द्वारा लिखी गई थी और इसमें ऐसी गलतियां भरी पड़ी हैं, जैसी बासवेल करते हैं। इसका एक पक्ष यह भी है कि उसकी प्रस्तुति के लिए न मेरे पास समय है, न स्थान। उद्धृत करने के लिए न स्थान है और न समय ही। मैं केवल उस बयान ख्1, की ओर ध्यान दिला सकता हूं जिसे मैंने श्री गांधी के आरंभिक अनशन की पूर्व संध्या पर प्रेस को छपने के लिए दिया था और इसमें उनकी चालों का पर्दाफाश किया गया था। यह कहना काफी है कि यद्यपि श्री गांधी ने आमरण अनशन की

  1. परिशिष्ट चार।