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तुच्छ चालें

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हिंदू आरक्षित सीटों पर ऐसे अस्पृश्य उम्मीदवार का कब्जा करा सकते थे, जो उनकी पसंद का हो और उनकी कठपुतली बन जाए। अंतिम चुनाव में ऐसे अस्पृश्य के चुने जाने के लिए उसे पैनल में आना आवश्यक था और वह पैनल में तभी आ सकता था, जब पैनल बड़ा हो। क्योंकि केवल अस्पृश्य मतदाताओं के पृथक निर्वाचन द्वारा पैनल का चुनाव बन सकता था। यह स्पष्ट है कि यदि पैनल में एक ही उम्मीदवार हो, तब वह अस्पृश्य का बहुत ही तगड़ा उम्मीदवार होगा और हिंदुओं की दृष्टि से बहुत ही खराब। यदि वहां पर दो उम्मीदवार होंगे, तो दूसरा पहले की अपेक्षा कुछ कम प्रभावशाली होगा। तीन होने पर तीसरा पहले और दूसरे से भी हिंदुओं की दृष्टि में ढीला होगा। चार होंगे, तो चौथा हिंदुओं के हिसाब से ऊपर वाले तीनों से गया बीता होगा। इस प्रकार यदि चार का पैनल होगा तो हिन्दु उसमें अस्पृश्यों का ऐसा प्रतिनिधि शामिल करा सकेंगे जो उन्हें सर्वाधिक उपयुक्त होगा। यही कारण था कि हिंदुओं ने हैमंड समिति के सामने न्यूनतम चार वैध उम्मीदवारों का पैनल बनाने के सिद्धांत पर अधिक जोर दिया।

इस प्रकार अनिवार्य मत विभाजक व्यवस्था पर हिंदुओं द्वारा अधिक जोर देने का उद्देश्य यही था कि अस्पृश्यों की सुरक्षित सीटों पर सवर्ण हिंदुओं का कब्जा हो जाए। एकत्रित मत व्यवस्था के अंतर्गत निर्वाचक के उतने ही मत हो सकते हैं, जितनी संख्या में सीटें हों। वह सभी मत एक उम्मीदवार को भी दे सकता है अथवा अपनी इच्छानुसार दो या दो से अधिक उम्मीदवारों में विभाजित कर सकता है। मत विभाजक व्यवस्था के अनुसार भी निर्वाचक (मतदाता) के उतने ही मत हो सकते हैं, जितनी सीटें हों, परंतु वह किसी एक उम्मीदवार को केवल एक वोट दे सकता है। यद्यपि दोनों व्यवस्थाओं में कोई विशेष अंतर नहीं है, क्योंकि एकत्रित मत व्यवस्था में भी मतदाता को अपने मत विभाजित करने से नहीं रोका जा सकता। वह एक उम्मीदवार को ही मत देने के लिए स्वतंत्र है। परंतु सवर्ण हिंदू कोई अवसर नहीं खोना चाहते थे। उनका मुख्य ध्येय था, संयुक्त निर्वाचन में अस्पृश्यों के लिए सुरक्षित सीटों पर उम्मीदवारों की झड़ी लगा दें, ताकि चुनाव द्वारा अपने कठपुतली अस्पृश्य उम्मीदवार के पक्ष में हिंदुओं के अधिक फालतू मतों द्वारा उन सीटों को हड़पा जा सके। उसका उद्देश्य था अस्पृश्यों के मतों से ज्यादा मत जुआना या जिसको उनकी पसंद का उम्मीदवार न जीत पाए। ऐसा तभी हो सकता था जबकि हिंदू अपने फालतू मतों को सामान्य अभ्यर्थी से हटाकर प्रत्यक्ष अभ्यर्थी को दिला दें। इस विभाजक व्यवस्था के अंतर्गत फालतू मतों की दिशा मोड़ना एकत्रित मत व्यवस्था की अपेक्षा कहीं अधिक संभव होगा। मत विभाजक व्यवस्था में हिंदू मतदाता हिंदू अभ्यर्थी को केवल एक वोट दे सकता है। दूसरा वोट जो हिंदू अभ्यर्थी के लिए उपयुक्त नहीं, केवल अस्पृश्य