3. तुच्छ चालें - Page 115

100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अभ्यर्थी के लिए होगा। इस प्रकार मत विभाजन गत व्यवस्था में अस्पृश्यों के लिए सुरक्षित सीटों में उम्मीदवारों की भरमार की संभावना है और यही कारण है कि हिंदू एकत्रित मत व्यवस्था की अपेक्षा उसे ही पसंद करते हैं। परंतु वे उस व्यवस्था को छोड़ना नहीं चाहते, क्योंकि उनके विचार से मत विभाजक व्यवस्था भी गलत साबित होती। मत विभाजक व्यवस्था के अंतर्गत मतदाता को अपने सभी मतों का प्रयोग करना जरूरी नहीं है। वह सवर्ण हिंदू को एक वोट दे सकता है और शेष मतों को प्रयोग न करने की उसे पूरी छूट है। यदि ऐसा ही होता, तो नामजद अस्पृश्य अभ्यर्थी को उन्हें जिताने की गुंजाइश नहीं रहेगी। इस अवसर को न छोड़ने के लिए ही सवर्ण हिंदू मत विभाजक व्यवस्था को इसलिए आवश्यक बनाना चाहते हैं, ताकि सवर्ण हिंदू मतदाता चाहते या न चाहते हुए भी अपना एक वोट अस्पृश्य अभ्यर्थी को दें, जो उनका नामजद किया हुआ हो और इस प्रकार उसे जिताने में उन्हें अवश्य सफलता मिलेगी।

इन बातों के संदर्भ में पूना पैक्ट अस्पृश्यों पर न केवल पहली चोट सिद्ध हुआ और वे हिंदू जो उसे पसंद नहीं करते थे, एक और वार करने पर आमादा थे। उन्होंने सवर्ण हिंदुओं ने दो प्रकार के विचार जो हेमंड समिति के सामने उठाए। उससे हिंदुओं द्वारा रचे गए षड्यंत्र का पक्का सबूत मिल जाता है कि उनका उद्देश्य यदि पूना पैक्ट को स्वीकार करना नहीं, तो अस्पृश्यों को उससे कोई लाभ न होने देने का था। अस्पृश्यों की राजनीतिक मांगों को कांग्रेस ने किस प्रकार विफल किया, यह कहानी यही समाप्त नहीं हो जाती। जो कुछ पहले लिखा जा चुका है, आगे लिखे जाने वाले भागों में उससे भी अधिक प्रकाश पड़ेगा।

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हम उस चुनाव से संबंधित कहानी को जारी रखते हैं। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अनुसार प्रांतीय विधान सभाओं के लिए फरवरी 1937 में जो चुनाव हुए थे, वह कांग्रेस के लिए चुनावों में उतरने का अवसर था। यह अस्पृश्यों के लिए भी पहला अवसर था, जब उन्हें अपने प्रतिनिधि चुनने की सुविधा मिली थी, जैसा कि स्व. दीवान बहादुर एम.सी. राजा ने बड़ी खुशी से आशा की थी कि अछूतों के लिए निर्धारित सीटों पर कांग्रेस कोई व्यवधान नहीं डालेगी। परंतु इन आशाओं की धज्जियां उड़ गईं। अस्पृश्यों के लिए आरक्षित स्थानों पर कांग्रेस के भाग लेने के पीछे उनके दो मकसद थे, पहला यह कि अपना बहुमत बनाने के लिए उन सुरक्षित सीटों को प्राप्त करना जिससे कांग्रेस सरकार बना सके। दूसरा श्री गांधी के इस कथन को साबित करना कि कांग्रेस अस्पृश्यों का प्रतिनिधित्व करती है और अस्पृश्य कांग्रेस में विश्वास करते हैं। इसलिए कांग्रेस पूरी भूमिका निभाने में तनिक भी नहीं हिचकिचाई। मैं तो यह कह सकता हूं कि उसने अस्पृश्यों के अहित की इच्छा से अस्पृश्यों के चुनाव में कांग्रेस