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तुच्छ चालें

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अधिनियम, 1935 को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। यह सभी को स्पष्ट था और बहुत से कांग्रेसी भी जानते थे कि इस घोषणा के पीछे कोई गंभीरता नहीं है। इसका उद्देश्य जनता की निगाहों में कांग्रेस की यह छवि बनाने को छोड़कर और कुछ नहीं था कि कांग्रेस ही एक क्रांतिकारी दल है, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकने की क्षमता रखता है। यही वह कथा थी, जिसकी कांग्रेस सदा रट लगाती थी। वह उनकी केवल एक चाल थी। कांग्रेस वही अधिकार प्राप्त करना चाहती थी, जो गवर्नर को संविधान के अंतर्गत विशेष परिस्थितियों में हस्तक्षेप करने के लिए मिले थे। कांग्रेस ने संविधान को अस्वीकार करने की घोषणा नहीं की, क्योंकि वह जानती थी कि संविधान ही वह साधन है, जिसके द्वारा ब्रिटिश सरकार नई संसदीय व्यवस्था चलाएगी और उसे कांग्रेस का सहयोग लेना होगा। ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को दरकिनार करने की धमकी दी थी। ब्रिटिश सरकार ने न केवल 1 अप्रैल, 1937 को संविधान के प्रांतीय अंश का शुभारंभ किया, बल्कि वास्तव में गैरकांग्रेसी अंतरिम मंत्रिमंडल भी बना डाला। कांग्रेसी सिहर उठे, क्योंकि वे सत्ता के भूखे थे और इन्होंने सौतिया डाह वाले राजनीतिज्ञों का जमघट बना रखा था। उन्हें अनुभव हुआ कि वे परिश्रम का फल चखने से वंचित किए जा रहे हैं। ब्रिटिश सरकार तथा कांग्रेस हाई कमान के बीच समझौतों का दौर शुरू हुआ। कांग्रेस हाई कमान ने मांग की कि यदि ब्रिटिश सरकार यह वचन दे कि मुख्य दायित्व संबंधी धाराओं के अंतर्गत दिए गए अधिकारों का प्रांतीय शासन में गवर्नर रोजाना हस्तक्षेप नहीं करेंगे, तो कांग्रेस ने जो इस बात के लिए बहुत समय से आस लगाए बैठी थी कि नया संविधान लागू हो, वचन देने की शर्त मान ली। उस समर्थन का आशय आश्चर्यजनक है कि कांग्रेस हाई कमान ने उस वचनबद्धता को ऐसा विस्तृत रूप दिया कि प्रांतीय गवर्नरों को प्रांतीय मंत्रिमंडलों में प्रतिनिधित्व देने के जो निर्देश दिए गए थे और इसके लिए जो अधिकार उन्हें मिले थे, गवर्नर उनका उपयोग न कर सकें। गवर्नर जिन्होंने कांग्रेस को पूरा स्थान दिया और अपने अधिकारों का समर्पण कर दिया एवं कांग्रेस के संविधान द्वारा प्रदत्त व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें सत्तासीन कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस ने दिमागी कलाबाजी करके अविलंब अस्पृश्यों और अन्य अल्पसंख्यकों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व देने के स्थान पर अंगूठा दिखा दिया।

अस्पृश्यों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व से वंचित करने की योजना कांग्रेस के दुर्भाग्य की द्योतक है। कांग्रेस ने अपने मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों को शामिल न करने का, जो तर्क दिया था कि एक दलीय मंत्रिमंडल होना चाहिए, क्योंकि उसे सामूहिक दायित्व निभाना होता है और कांग्रेस अल्पसंख्यक समुदायों को मंत्रिमंडल में तभी स्थान दे सकती है, जबकि वे कांग्रेस में मिल जाए और उसकी सदस्यता ग्रहण कर लें। दूसरे अल्पसंख्यकों के लिए ऐसे तर्कों में कितनी भी वजन