3. तुच्छ चालें - Page 119

104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हो, परंतु अस्पृश्यों के लिए ऐसे तर्कों का कोई मूल्य नहीं है। कांग्रेस अस्पृश्यों को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने से अपने को नहीं बचा सकती थी। इसके दो कारण थेः पहला कारण यह है कि कांग्रेस पूना पैक्ट की शर्तों के अनुसार अस्पृश्यों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व देने के लिए बाध्य थी और दूसरी बात कांग्रेस यह नहीं कह सकती थी कि कांग्रेस की नीति पर चलने वाली व्यवस्थापिकाओं में अस्पृश्य कांग्रेस के टिकट पर जीत कर पहुंचे थे। तब कांग्रेस ने अस्पृश्यों को प्रांतीय मंत्रिमंडलों में क्यों नहीं लिया? इसका उत्तर केवल यही है कि वह कांग्रेस की नीति का एक भाग था कि अस्पृश्यों को मंत्रिमंडलों में प्रतिनिधित्व न दिया जाए और इस नीति को श्री गांधी का समर्थन प्राप्त था। जिन्हें इस कथन की सत्यता में कोई संदेह हो वे निम्नलिखित प्रमाण पर विचार करें -

प्रमाण के लिए सर्वविदित पहली घटना हमें वहां मिलती है, जब माननीय डॉ. खरे मध्य प्रांत में कांग्रेस के प्रधानमंत्री (प्राइम मिनिस्टर) थे अैर उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया। इसलिए अपने मंत्रिमंडल में आंतरिक झगड़ों और कठिनाइयां पैदा करने वालों के कारण डॉ. खरे ने उन मंत्रियों से छुटकारा पाने के लिए एक युक्तिसंगत तरीका यह अपनाया कि उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया तथा अन्य मंत्रियों के भी त्यागपत्र प्राप्त कर नई सरकार बनाने के लिए गवर्नर को सिफारिश की। इसके बाद गवर्नर ने वैधानिक औपचारिकताएं पूरी करते हुए डॉ. खरे को दूसरा मंत्रिमंडल गठित करने के लिए आमंत्रित किया। डॉ. खरे ने आमंत्रण स्वीकार किया और कुछ पुराने विवादास्पद मंत्रियों को छोड़ते हुए कुछ नए मंत्री शामिल करके मंत्रिमंडल का पुनः गठन किया। डॉ. खरे का नया मंत्रिमंडल इस अर्थ में पुराने मंत्रिमंडल से भिन्न था कि उसमें एक अस्पृश्य मंत्री, श्री अग्निभोज को शामिल किया गया था, जो कांग्रेस दल के थे और मध्य प्रांत की व्यवस्थापिका के सदस्य भी थे। इसके साथ-साथ वह मंत्री बनने योग्य पूर्ण शैक्षिक योग्यता प्राप्त सदस्य थे। 26 जुलाई, 1938 को वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई और यह प्रस्ताव पास किया गया कि डॉ. खरे ने पुराने मंत्रिमंडल के अपने सहयोगियों सहित त्यागपत्र देकर बहुत गंभीर गलती की और नया मंत्रिमंडल गठित कर उन्होंने अनुशासनहीनता की है। नए मंत्रिमंडल का गठन करने में उन्होंने क्या गलती की, इसके स्पष्टीकरण में डॉ. खरे ने खुले तौर पर कहा कि श्री गांधी के अनुसार एक अस्पृश्य को मंत्रिमंडल में शामिल करना अनुशासनहीनता थी। डॉ. खरे के अनुसार श्री गांधी ने कहा कि यह निर्णय गलत था, क्योंकि उन्होंने अस्पृश्यों की आकांक्षाओं और आशाओं को प्रोत्साहन दिया, जिसके लिए उन्हें क्षमा नहीं किया जा सकता। यह बयान डॉ. खरे ने कई बार खुलकर राजनीतिक मंच से दिया, जिसका श्री गांधी ने कभी खंडन नहीं किया।