तुच्छ चालें
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इस बात को सिद्ध करने के लिए और भी स्पष्ट सबूत प्राप्त हैं। 1942 में अस्पृश्यों की अखिल भारतीय सभा हुई थी। उस सभा में दलितों की कुछ राजनैतिक मांगों के प्रस्ताव पास हुए थे। कांग्रेस पार्टी के एक अस्पृश्य सदस्य ने सभा में भाग लिया था। वह श्री गांधी के पास यह जानने के लिए गया कि वह उन मांगों के बारे में क्या कहते हैं और उनसे निम्नलिखित पांच प्रश्न पूछेµ
फ्1. भावी संविधान में हरिजनों की क्या स्थिति होगी?
- क्या आप सरकार और कांग्रेस को यह राय देंगे कि जनसंख्या के
आधार पर पंचायत बोर्ड से राज्य परिषद तक पहुंचने के लिए पांच सीटें
निश्चित की जाएं?
- क्या आप कांग्रेस और विभिन्न बहुमत वाले दलों के नेताओं से प्रांतीय
विधान-मंडलों में अनुसूचित जाति के जिन विधायकों को अनुसूचित जातियों
का विश्वासप्राप्त है, उन्हें मंत्रिमंडल में नामजद करने की सलाह देंगे?
- हरिजनों के पिछड़ेपन के कारण क्या आप सरकार को सलाह देंगे
कि नियमों में इस प्रकार का प्रावधान किया जाए कि स्थानीय निकायों और
म्युनिसिपल कौंसिलों के कार्यकारी पदों पर बारी-बारी से सांप्रदायिक आधार
पर हरिजनों को प्रधान और चेयरमैन बनने का अवसर दें?
- जिला कांग्रेस कमेटी से कांग्रेस वर्विंQग कमेटी तक हरिजनों को पहुंचने
के लिए सीटों का कुछ प्रतिशत क्यों नहीं निश्चित किया जाता?य्
गांधी जी ने 2 अगस्त, 1942 के हरिजन पत्र के माध्यम से उनके प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार दिया था -
फ्1. मेरी सहमति से बने संविधान में इस बात का प्रावधान किया जाएगा कि
किसी भी रूप में अस्पृश्यता बरतना अपराध माना जाए और आबादी के अनुपात
से अस्पृश्यों के लिए सभी निर्वाचित संस्थाओं में सीटें आरक्षित होंगी।
उपरोक्त ही देखें।
मैं नहीं कह सकता। यह सिद्धांत खतरनाक है। उपेक्षित वर्गों का
संरक्षण उस सीमा तक ले जाना ठीक नहीं जहां से उनका और देश का
नुकसान होता हो। एक मंत्री के रूप में किसी व्यक्ति का चुनाव उसकी
उच्च योग्यता और उसकी सर्वव्यापी लोकप्रियता पर निर्भर करता है। जो
व्यक्ति चुनाव जीतकर सीट प्राप्त करता है, वह उसकी स्वाभाविक योग्यता
और लोकप्रियता पर निर्भर करता है।