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घृणित समर्पण

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II

उस मंदिर प्रवेश के आंदोलन के विषय में अस्पृश्यों का क्या दृष्टिकोण था? श्री गांधी ने मंदिर प्रवेश आंदोलन में मेरा समर्थन मांगा। मैं ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ और इस विषय में प्रेस में अपना बयान छपने को दे दिया। इस विषय में मेरे विचार का क्या आधार था, पाठकों को जानने में सहायता मिलेगी। वह बयान इस प्रकार थाःµ

मंदिर प्रवेश विधेयक पर बयान

14 फरवरी, 1933

यद्यपि मंदिर प्रवेश से संबंधित प्रश्न पर विवाद सनातनी हिंदुओं तथा

श्री गांधी तक सीमित है, निस्संदेह दलित वर्गों को इस विषय में महत्वपूर्ण

भूमिका निभानी है क्योंकि वे निर्णायक पक्ष हैं और इस पर उन्हें गंभीरता

से विचार करना है कि विधेयक के अंतिम निर्णय पर दलित वर्ग के लोग

किस स्थिति में होंगे। इसलिए उनका दृष्टिकोण परिभाषित होना आवश्यक

है, ताकि अनिश्चितता की गुंजाइश न रहे।

श्री रंगा अय्यर ने मंदिर प्रवेश विधेयक का जो प्रारूप तैयार किया है,

दलित वर्ग के लोग संभवतः उसका समर्थन नहीं करेंगे। इस विधेयक का

सिद्धांत यह है कि यदि म्युनिसिपल और स्थानीय निकायों के मतदाता, अपने

पड़ोस के किसी मुख्य मंदिर के लिए जनमतसंग्रह का निश्चय करते हैं कि

उस मंदिर में दलित वर्ग के लोगों को जाने की अनुमति दी जाएगी, तब

मंदिर के न्यासी अथवा प्रबंधक उस फैसले को कार्यरूप में परिणित करेंगे।

यह सिद्धांत साधारणतः बहुमत शासन पर आधारित है, इसमें मौलिक अथवा

क्रांतिकारी कुछ नहीं है और यदि सनातनी हिंदू बुद्धिमान हुए, तो वे बिना

किसी शंका के उसे स्वीकार कर लेंगे।

इस सिद्धांत पर आधारित विधेयक को दलित वर्गों का समर्थन न मिलने

के दो कारण हैंः पहला कारण यह है कि उस विधेयक से निकट भविष्य

में अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश में शीघ्रता नहीं आ सकती। यह सच है कि

उस विधेयक के अंतर्गत यदि बहुमत के फैसले के अनुसार, न्यासी अथवा

प्रबंधक दलित वर्गों के लिए मंदिर खोल देता है तो अल्पसंख्यक को उसके

विरुद्ध निषेधाज्ञा प्राप्त करने का अधिकार नहीं होगा। परंतु विधेयक की इस

धारा से किसी प्रकार का कोई सन्तोष प्राप्त करने और विधेयक के प्रस्तावक