4. घृणित समर्पण - Page 131

116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

को बधाई देने से पहले हमें आवश्यक रूप से यह विश्वास हो जाना चाहिए कि जब प्रश्न पर मतदान होगा, तो बहुमत मंदिर प्रवेश के पक्ष में होगा। यदि कोई इस प्रकार के भ्रमजाल का शिकार नहीं हुआ है, तो उसे स्वीकार करना होगा कि मंदिर प्रवेश के पक्ष में बहुमत की आशा मुश्किल से ही पूरी होगी। निस्संदेह बहुमत आज विरुद्ध है। दरअसल प्रस्तावक ने भी इसे शंकराचार्य के साथ हुए अपने पत्र व्यवहार में स्वीकार किया है।

विधेयक पास हो जाने के बाद उत्पन्न स्थिति में ऐसा क्या है जिससे यह आशा हो जाती है कि बहुमत भिन्न रुख अपनाएगा। मुझे ऐसा कुछ नजर नहीं आता। गुरूवयूर मंदिर के संबंध में, जो जनमतसंग्रह के परिणाम सामने आए थे, निस्संदेह मुझे वे याद आते हैं। परंतु मैं जनमतसंग्रह के प्रभाव को मानने के लिए तैयार नहीं हूं, क्योंकि मैं श्री गांधी की जीवनचर्या को ही इसका प्रतिरूप मानता हूं। इस प्रकार का आकलन श्री गांधी की जीवनचर्या को दरकिनार करके ही किया जाए।

दूसरे, विधेयक अस्पृश्यता को पापाचार नहीं मानता। विधेयक अस्पृश्यता को केवल सामाजिक दोष मानता है और अन्य प्रकार की सामाजिक बुराइयों की अपेक्षा अधिक दोषपूर्ण नहीं मानता। यह विधेयक अस्पृश्यता को गैरकानूनी घोषित नहीं करता। यदि बहुमत ऐसा करने का फैसला करे, तो उसमें कोई जोर नहीं होगा। पाप और अनैतिकता बर्दाश्त करने योग्य नहीं बन सकती, यदि बहुमत उन्हीं के वशीभूत हो जाए अथवा उन अनैतिकताओं के अनुसार चलना पसंद करे। यदि अस्पृश्यता एक पापाचार एवं अनैतिकता है, तो दलित वर्गों की दृष्टि में उसे निस्संकोच तिलांजलि दे देनी चाहिए, चाहे बहुसंख्यक अस्पृश्यता के पक्ष में ही क्यों न हों। इसी तरीके से सभी अनैतिक पाए जाने वाले रीतिरिवाजों के संबंध में न्यायालयों में कार्रवाई होती है।

इस विधेयक में ऐसा कुछ नहीं है। विधेयक के लेखक ने अस्पृश्यता की प्रथा पर गंभीर रुख नहीं अपनाया। है। केवल मद्यपान की आदत में थोड़े सुधार की चर्चा की गई है। वास्तव में वे उपरोक्त दोनों बुराइयों को एक पलड़े में तौलते हैं। वे मद्यपान बन्द करने के लिए स्थानीय जनभावना के द्वारा नशाबंदी चाहते हैं। दलित वर्गों के ऐसे हमदर्दों के प्रति कोई कृतज्ञता नहीं प्रकट कर सकता, जो अस्पृश्यता को शराब पीने की आदत से अधिक बुरा नहीं समझता। यदि श्री रंगा अय्यर केवल कुछ ही महीने पहले की उस