4. घृणित समर्पण - Page 132

घृणित समर्पण

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बात को भूल न गए होते जिसमें श्री गांधी ने अस्पृश्यता निवारण के लिए अपने को आमरण अनशन के लिए तैयार किया था, तो इस अभिशाप के प्रति वे और कठोर रुख अपनाते और एक व्यापक सुधार आंदोलन लेकर सामने आते कि इसे जड़-मूल से उखाड़ दिया जाए। क्षमता एवं गुणों की दृष्टि से उसमें चाहे जितनी कमियां हों, यदि विधेयक में अस्पृश्यता को पाप मान लिया जाता, तो दलित वर्ग उस विधेयक से कुछ आशा करता।

सचमुच मेरी समझ में नहीं आता कि इस विधेयक से श्री गांधी कैसे संतुष्ट हो गए जो अस्पृश्यता को पाप मानने पर जोर दिया करते थे। बहरहाल इस विधेयक से दलित वर्गों को संतोष नहीं हो सकता। विधेयक अच्छा है या बुरा, पर्याप्त है अथवा अपर्याप्त यह प्रश्न गौण है।

मुख्य प्रश्न हैः दलित वर्ग के लोग मंदिर प्रवेश चाहते हैं अथवा नहीं? इस मुख्य प्रश्न को दलित वर्ग के लोग दो दृष्टिकोणों से देखते हैं। पहला है, भौतिक दृष्टिकोण। दलित वर्ग के लोग सोचते हैं कि उनका उत्थान उच्च स्तर की शिक्षा, उच्च स्तर की नौकरियां और जीविका के अच्छे साधनों से ही संभव है। एक बार जब वे सामाजिक जीवन के उच्च स्तर पर पहुंच जाएंगे, तो उनका सम्मान बढ़ेगा और तब समाज में उनका आदर-सम्मान होने लगेगा, तो रूढि़वादी हिंदुओं में भी परिवर्तन आएगा और यदि ऐसा न हुआ, तो उससे उन दलित वर्गों के भौतिक हितों की कोई विशेष हानि न होने पाएगी। इन मार्गों पर चलते हुए दलित वर्ग के लोगों का कहना है कि वे मंदिर प्रवेश के थोथे आंदोलन में अपनी शक्ति बरबाद नहीं करेंगे। एक दूसरा कारण भी है, जिससे वे मंदिर प्रवेश के लिए नहीं झगड़ना चाहते और यह तो आत्म-सम्मान का प्रश्न है।

अभी बहुत दिन नहीं हुए, जब क्लबों के दरवाजों और भारत के सामाजिक स्थानों में यूरोपियन लोगों ने तख्तियां टांगी थीं और उन पर लिखा होता था - कुत्तों और भारतीयों को प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। आज हिंदुओं के मंदिरों पर भी ऐसी ही तख्तियां लटकी हैं। अंतर केवल इतना है कि सभी हिंदू, यहां तक कि जानवर और कुत्ते भी मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं, केवल अस्पृश्य प्रवेश नहीं कर सकते। दोनों मामलों में स्थिति एक-सी है। परंतु हिंदुओं ने उन स्थानों पर प्रवेश करने की कभी अनुमति नहीं मांगी, जहां पर यूरोपियनों ने अपने प्रबंध से उन्हें बहिष्कृत किया था। अस्पृश्य उस स्थान पर प्रवेश क्यों करना चाहते हैं, जहां हिंदुओं ने दंभ से उन्हें बहिष्कृत