4. घृणित समर्पण - Page 133

118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कर रखा है? वे हिंदुओं से यह कहने के लिए तैयार हैं कि तुम मंदिरों के दरवाजे खोलो या न खोलो, यह तुम्हारी मर्जी है, मैं इस पर विचलित नहीं होता। यदि आप सोचते हैं कि मानवीय व्यक्तित्व की पवित्रता को आदर का स्थान न देना बुरी बात है, तब आप अपने मंदिरों को खोलिए और इन्सानियत दिखाइए। यदि आप भलेमानुष बनने की अपेक्षा हिंदू ही बने रहना ठीक समझते हैं, तो मंदिरों के दरवाजे बंद रखिए, और भाड़ में जाइए, हमें मंदिरों में आने की कोई जरूरत नहीं।

मैंने इस रूप में इस प्रकार का तर्क करना इसलिए आवश्यक समझा कि पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे उन मनुष्यों के मस्तिष्क का भ्रम दूर करना चाहता हूं, जिन्हें विश्वास है कि दलित वर्गों के लोग अपने संरक्षण के लिए उनकी ओर आशा की दृष्टि से देख रहे हैं।

उनका दूसरा दृष्टिकोण आध्यात्मिक दृष्टिकोण है। धर्मभीरू लोगों की तरह दलित वर्ग के लोग भी मंदिर प्रवेश चाहते हैं अथवा नहीं। इतना ही प्रश्न है। आध्यात्मिक दृष्टि से दलित वर्गों के लोग मंदिर प्रवेश के विरुद्ध भी नहीं हैं। परंतु भौतिक दृष्टिकोण को अकेला नहीं रख सकते। परंतु उनका अंतिम उत्तर श्री गांधी और हिंदुओं द्वारा इस प्रश्न के उत्तर पर निर्भर करता है कि मंदिर प्रवेश की अनुमति के पीछे उनका सर्वोच्च लक्ष्य क्या है? क्या मंदिर प्रवेश हिंदू समाज में दलित वर्गों के सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाने का सर्वोच्च लक्ष्य है? अथवा यह उनके उत्थान का पहला कदम है। यदि पहला कदम है, तो अंतिम लक्ष्य क्या है? यदि मंदिर प्रवेश अंतिम उद्देश्य है, तो दलित वर्ग के लोग उसे दूर से ही प्रणाम करते हैं। वास्तव में वे उसे केवल अस्वीकार ही नहीं करेंगे, वरन् यदि वे अपने आपको हिंदुओं द्वारा, अस्वीकृत पाएंगे, तब वे अपना भाग्य कहीं और आजमाएंगे। दूसरी ओर, यदि मंदिर प्रवेश इस दिशा में पहला कदम है, तो वे उसका समर्थन कर सकते हैं। तब आजकल देश में जो राजनीति चल रही है, स्थिति उसके अनुकूल होगी। सभी भारतीयों ने भारत के लिए डोमीनियन स्टेटस की मांग की है। वास्तविक संविधान डोमीनियन स्टेटस के आगे बहुत कम होगा। परंतु बहुत से भारतीय उसे स्वीकार कर लेंगे। क्यों? इसका उत्तर यह है कि चूंकि लक्ष्य घोषित कर दिया गया है इसलिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उसे एक-एक पग बढ़ाकर प्राप्त करें या एक छलांग में। परंतु यदि ब्रिटिश सरकार स्वशासन के लक्ष्य को नहीं स्वीकार करती, तो कोई भी आंशिक सुधार स्वीकार नहीं