घृणित समर्पण
119
करेगा। अभी बहुत से लोग इसे स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। इसी प्रकार यदि श्री गांधी और समाज सुधारक दलित वर्गों के लिए घोषणा करते हैं कि उनका लक्ष्य हिंदू समाज में अस्पृश्यों की हैसियत बढ़ाना है, तभी दलित वर्ग मंदिर प्रवेश पर कुछ कह सकते हैं। लक्ष्य घोषित होना ऐसा धर्म है, जो उन्हें समाज में समानता का स्तर दे सके, इस भ्रम कोदर करने के लिए मैं विस्तार से सैकड़ों वर्षों से चली आ रही धर्मनिरपेक्ष सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक मान्यताप्राप्त आस्थाओं के बीच में एक रेखा खींचता हूं। सभ्य समाज में सामाजिक कुरीतियों का धर्म के आधार पर औचित्य ठहराना बहुत ही घृणित और अधम कार्य है। दलित वर्ग के लोग असमानताजनित अन्यायों और अत्याचारों का जुआ तो उतार कर नहीं फेंक सकते, परंतु अब उन्होंने पक्का इरादा कर लिया है कि अब उस धर्म को नहीं सहन करेंगे, जो अत्याचारों को जारी रखने का हामी हो।
यदि उनका धर्म हिंदू धर्म होता है, तो उस धर्म को सामाजिक समानता का धर्म होना पड़ेगा। केवल हिंदू धर्म संहिता में सबके लिए मंदिर प्रवेश को जोड़कर संशोधन कर देने मात्र से वह धर्म सामाजिक समानता का धर्म नहीं बन जाता। यदि मैं राजनीतिक शब्दों का इस्तेमाल करूं, तो बस इतना ही कह सकता हूं कि आप उन्हें विदेशी न मानकर स्वदेशी ही मान लें। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वे इससे उस स्तर तक पहुंच जाएंगे, जहां पर वे स्वतंत्र और समान हो जाएं, क्योंकि हिंदू धर्म सामाजिक स्तर पर समानता के सिद्धांत को मान्यता प्रदान नहीं करता। इसके विपरीत वह धर्म तो समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की श्रेणियां बनाकर असमानता का पोषण करता है, जिसमें ऊपर से नीचे तक की सीढ़ी के झंडों के समान ऊपर वाला नीचे वाले को घृणा और अनादर की दृष्टि से देखता है। हिंदू यदि सामाजिक समानता लाएं, तब उस धर्म संहिता में केवल मंदिर प्रवेश का विधान कर संशोधन करना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता चातुरवर्ण्य के सिद्धांत से इसको मुक्त करने की है। चतुर्वर्ण व्यवस्था ही सारी असमानताओं की जननी है और जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता का मूल भी, जो असमानताओं के विभिन्न रूपों में व्याप्त है। जब तक वर्ण व्यवस्था रहेगी दलित वर्ग के लोग मंदिर प्रवेश ही नहीं वरन हिंदू धर्म को भी अस्वीकार करेंगे। चातुरवर्ण्य और जाति व्यवस्था दोनों ही दलित वर्गों के आत्म-सम्मान के विरुद्ध है। जब तक जाति व्यवस्था इस धर्म का मूल सिद्धांत रहेगी तब तक दलित वर्ग के लोग