4. घृणित समर्पण - Page 136

घृणित समर्पण

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जातीय बंधनों को स्वीकार नहीं करेंगे। यदि वे ऐसा करेंगे, तो वे टुकड़ों में

बंट जाएंगे। कानून की जबरदस्ती से मंदिर में प्रवेश नहीं कराया जा सकता।

गांवों में सवर्ण हिंदू खुले तौर से अथवा परोक्ष रूप में कानून का उल्लंघन

करेंगे। गांव के दलित वर्ग के लिए यह वैसा ही होगा जैसे कि कोई किसी

कागज पर मिठाई लिख कर दे दी जाए और अस्पृश्य से उसका स्वाद लेने

के लिए कहे। देश को भ्रम और गड़बड़ी से बचाने के लिए जनता के बीच

उपरोक्त तथ्य लाए गए हैं।य्

मैंने अपने बयान में भी श्री गांधी के सामने जो प्रश्न रखा था, उसका उन्होंने मुझे टका-सा जवाब दे दिया। उन्होंने कहा कि वह यद्यपि अस्पृश्यता के विरुद्ध हैं, जाति के विरुद्ध नहीं हैं। यदि वह तनिक भी उसके पक्ष में होते तो अस्पृश्यता निवारण के अतिरिक्त भी वह सामाजिक सुधार का कार्य न करते। मेरे लिए अपना दृष्टिकोण निश्चित करने के लिए इतना ही पर्याप्त था। मैंने अब और आगे मंदिर प्रवेश के विषय में चुप लगाए रहने का फैसला किया।

स्व. दीवान बहादुर राजा अस्पृश्य जाति के एकमात्र प्रमुख नेता थे। ऐसा कहने में किसी को कोई संकोच नहीं होगा कि श्री राजा ने इस दिशा में खेदजनक भूमिका निभाई। श्री दीवान बहादुर वर्ष 1927 से केंद्रीय सभा के नामजद सदस्य थे। सभा के भीतर अथवा बाहर उन्हें कांग्रेस से कोई मतलब नहीं था। न किसी संयोगवश और न किसी भूल से ही वह कांग्रेस के पक्ष में थे। वास्तव में वह केवल कांग्रेस के आलोचक नहीं थे वरन् उसके विरोधी थे। वह सरकार के बहुत विश्वासपात्र मित्रों में से थे। वह अस्पृश्यों के पृथक निर्वाचन के पक्ष में खड़े हुए थे, जिसका कांग्रेस पूर्णरूपेण विरोध करती थी। वर्ष 1932 के कठिन समय में दीवान बहादुर ने अचानक सरकार का साथ छोड़ने और कांग्रेस का पक्ष लेने का फैसला किया। यह संयुक्त चुनाव और मंदिर प्रवेश के विषय में कांग्रेस के समर्थक सिद्ध हुए। सार्वजनिक जीवन में ऐसा चरित्र मिलना मुश्किल है। उनका एक ही उद्देश्य था कि अपना उल्लू सीधा करना। दीवान बहादुर एकदम कट क्यों गए? उसका कारण यह था कि सरकार ने गोलमेज सम्मेलन में अस्पृश्यों का प्रतिनिधित्व करने के लिए उन्हें नामजद नहीं किया था। वरन् उनके स्थान पर दीवान बहादुर और श्रीनिवासन को नामजद किया था। लेकिन भारत सरकार के पास उन्हें नामजद न करने के पर्याप्त आधार थे। यह निश्चय किया गया था कि न तो साइमन कमीशन का सदस्य और न ही केंद्रीय सभा का सदस्य गोलमेज सम्मेलन का सदस्य हो सकता है। स्व. दीवान बहादुर केंद्रीय सभा के सदस्य