122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
थे। इसलिए उनको छोड़ना पड़ा। यह स्वाभाविक स्पष्टीकरण था। परंतु दंभ से चूर दीवान बहादुर राजा उस बात को नहीं सह सके। जब मद्रास में कांग्रेस मंत्रिमंडल बना, जैसे ही उन्होंने देखा कि पूना पैक्ट किस प्रकार पैरों के नीचे कुचला जा रहा है और किस प्रकार उसके विरोधी मंत्री बन गए और किस प्रकार कांग्रेस कार्यकर्ता होते हुए भी उनकी उपेक्षा की गई थी, वह घोर पश्चाताप करने लगे। सत्य तो यह है कि वर्ष 1932 में कठिनाई के दिनों में दीवान बहादुर राजा ने कांग्रेस को जोरदार समर्थन दिया था। वह केवल कांग्रेस की भीड़ के साथ-साथ दौड़ ही नहीं रहे थे, वरन् अस्पृश्यता के विरुद्ध कानून बनाने का विरोध करने में कांगेस का साथ भी दे रहे थे। उन्होंने दो विधेयक पेश करने का श्रेय भी लिया। उनका पहला विधेयक था, अस्पृश्यता निवारण विधेयक और दूसरा था दंड प्रक्रिया संशोधन विधेयक।
III
श्री गांधी ने किसी विरोध पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने इस बात की भी परवाह नहीं की कि वह विरोध चाहे सनातनी हिंदुओं की ओर से हुआ हो, अथवा अस्पृश्यों की ओर से। वह अपने लक्ष्य की ओर दीवानगी की हालत में बढ़ते रहे। यह जानना भी दिलचस्प है कि इस आंदोलन का क्या हुआ? इस पुस्तक के सीमित पृष्ठों में प्रत्येक घटना को विस्तार से वर्णन करना संभव नहीं है।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि अस्पृश्यता निवारण की दिशा में मंदिर और कुएं
खोल देने के बाद हिंदुओं की मनोवृत्ति कुत्ते की पूंछ की तरह फिर टेढ़ी हो गई। श्री गांधी के पत्र फ्हरिजनय् के स्तंभ ‘वीक टू वीक’ में जो रिपोर्ट निकला करती थी, वे धीरे-धीरे कम होकर नदारद होने लगी। जहां तक मेरी बात का संबंध है, मुझे यह समझने में कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि हिंदू दिल को इतनी जल्दी लकवा मार जाएगा। मुझे कभी भी विश्वास नहीं था कि हिंदुओं के सीने में कोई सहृदयता भी है। फ्हरिजनय् पत्र के स्तंभ ‘वीक टू वीक’ में दुनियां की आंखों में धूल झोंकने के लिए गप्प छप रहा था। वास्तव में फ्हरिजनय् के स्तंभ का अधिकांश भाग जिन समाचारों से भरा रहता था, वह एक साजिश का हिस्सा थे, केवल कांग्रेस द्वारा दुनियां को दिखाने के लिए फरेब और प्रोपेगंडा था कि हिंदुओं ने अस्पृश्यता निवारण का बीड़ा उठा रखा है। अधिकांश मंदिर, जो अस्पृश्यों के लिए खोले गए बताए थे, ऐसी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में थे कि वहां पर कुत्ते और गधों की महफिल जुड़ा करती थी। कांग्रेस आंदोलन का बुरा प्रभाव यह हुआ कि राजनीतिक मस्तिष्क वाले हिंदुओं का एक ऐसा झुंड तैयार हो गया जिसे अपने लाभ के लिए झूठ बोलने में हिचक नहीं थी। इस प्रकार मंदिर प्रवेश आंदोलन, जिसमें हिंदुओं ने साधारण जनता के सामने अपने को प्रदर्शित किया