124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हैं, इससे समस्या हल होने वाली नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में यह सोचने
का कोई औचित्य नहीं कि वह मेरे ही अधिकार में है कि मैं गुरूवयूर
मंदिर को अवर्ण लोगों के लिए खोल दूं, जैसा कि मंदिर प्रवेश आंदोलन
के समर्थक चाहते हैं।य्
इन परिस्थितियों में श्री गांधी के लिए अनशन करना आवश्यक हो गया था। परंतु उन्होंने अनशन नहीं किया। उन्होंने अपनी स्थिति में परिवर्तन करते हुए कहा कि यदि पोन्ननि तालुक में जनमतसंग्रह कराया जाए, जहां पर मंदिर स्थित है और यह फैसला हो कि वहां के अधिकांश लोग अस्पृश्य लोगों के लिए मंदिर खोलने के विरुद्ध हैं, तो मैं अनशन रोक दूंगा। तदनुसार जनमतसंग्रह किया गया। मतदान केवल उन्हीं तक सीमित था, जो वास्तव में मंदिर में जाया करते थे। जो मंदिर के अधिकारी नहीं थे और जो मंदिर नहीं जाते थे, वे मतदाता सूची से निकाल दिए गए। यह रिपोर्ट दी गई कि जो प्रतिशत मतदान करने योग्य था, उनमें से 73 प्रतिशत ने मतदान किया। परिणाम यह घोषित किया गया कि 56 प्रतिशत मंदिर प्रवेश के पक्ष में 9 प्रतिशत विरोध में, 8 प्रतिशत निष्पक्ष और 27 प्रतिशत ने मतदान में भाग नहीं लिया।
जनमतसंग्रह के इस परिणाम पर श्री गांधी को अनशन करना था, परंतु उन्होंने नहीं किया। इसके बजाए 29 दिसंबर, 1932 को गांधी जी ने निम्नलिखित बयान छपने के लिए प्रेस को दिया -
फ्इस शासकीय घोषणा को ध्यान में रखते हुए कि चूंकि मद्रास विधान
परिषद में मंदिर प्रवेश के बारे में डॉ. सुब्बारायन द्वारा विधेयक पेश किए
जाने की अनुमति संबंधी वायसराय के निर्णय की घोषणा संभवतः 15 जनवरी
से पहले नहीं की जा सकती, अतः नव वर्ष के दूसरे दिन से आरंभ किया
जाने वाला अनशन अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया जाएगा और
सरकारी फैसले तक के लिए स्थगित रहेगा। श्री केलप्पन इस स्थगन से
सहमत हैं।य्
वायसराय की जिस घोषणा का उल्लेख श्री गांधी ने किया, उसमें विधानमंडल में मंदिर प्रवेश विधेयक पेश होने की अनुमति वायसराय देते या न देते यह निश्चित नहीं था। वायसराय ने विधेयक पेश करने की अनुमति दे दी। फिर भी श्री गांधी ने अनशन नहीं किया। उन्होंने केवल अनशन करना ही नहीं छोड़ दिया, वरन् उस आंदोलन को ही बिल्कुल भुला दिया। तब से गुरूवयूर मंदिर प्रवेश सत्याग्रह के बारे में कुछ भी नहीं सुना और आज भी मंदिर अस्पृश्यों के लिए बंद है।