4. घृणित समर्पण - Page 141

126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

को व्यापक रूप से उस पर जनता की राय जानने के लिए परिचालित किया जाए। यह भी समझ लेना चाहिए कि मंदिर प्रवेश से संबंधित विधेयक केंद्रीय विधानमंडल में पेश होने की स्वीकृति किसी भी प्रकार से सरकार की प्रतिबद्धता नहीं कही जा सकती। दूसरे ही दिन श्री गांधी ने एक बयान इस प्रकार जारी किया µ

फ्मैं इसे हरि इच्छा मानता हूं। वह हर समय मेरी परीक्षा लेना चाहता है।

अखिल-भारतीय विधेयक को दी गई स्वीकृति हिंदू धर्म तथा सुधारकों के लिए

अनजाने में दी गई चुनौती है। यदि सुधारक अपने आप में सच्चा है, तो हिंदू

धर्म अपनी रक्षा स्वयं कर लेगा। इस प्रकार सरकारी फैसले को हरि इच्छा के

रूप में स्वीकार करना चाहिए। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है तथा इससे

भारत और संसार को समझ जाना चाहिए कि भारत में अब नैतिक संघर्ष

प्रबलता से चल रहा है। सनातनी हिंदू जो चाहे फैसला करें, मंदिर प्रवेश का

आंदोलन धुर दक्षिण में, गुरूवयूर से उत्तर में हरिद्वार तक फैल गया है। मेरा

अनशन जो कि अभी तक स्थगित है, अब केवल गुरूवयूर पर ही निर्भर नहीं

है, बल्कि स्वतः ही सभी मंदिरों तक अपने आप फैलता जा रहा है।य्

इस बात को कोई भी समझ सकता है कि विधेयक की विधायी प्रक्रिया में कैसा तमाशा हुआ। 24 मार्च, 1933 को श्री रंगा अय्यर ने सभा में विधिवत विधेयक पेश किया, क्योंकि वह विधेयक श्री गांधी की चाहत थी, असेम्बली के कांग्रेसी सदस्य विधेयक को समर्थ्न देने के लिए तैयार थे। श्री गांधी ने श्री राजगोपालाचारी और घनश्याम दास बिड़ला को विधेयक आसानी से पास कराने के विचार से गैर-कांग्रेसियों से समर्थन जुटाने के लिए नियुक्त किया। श्री गांधी ने कहा कि वे उनकी अपेक्षा अच्छे प्रचारक हैं। कोलेगोंड के राजा ने विधेयक को पुनः स्थापित करने के प्रस्ताव का विरोध किया तथा श्री थम्पन ने कहा कि विधेयक विधानमंडल के अधिकार-क्षेत्र से बाहर है। प्रेसीडेंट ने श्री थम्पन की आपत्ति को अस्वीकार कर दिया और विधेयक पुरः स्थापित किए जाने की अनुमति दे दी। श्री रंगा अय्यर ने फिर एक प्रस्ताव रखा कि मंदिर प्रवेश विधेयक को 30 जुलाई तक उस पर जनमत जानने के लिए परिचालित किया जाए। राजा बहादुर कृष्णमाचारी ने परिचालन में प्रस्ताव का विरोध किया और प्रस्तावित विधेयक का भी तीव्र विरोध किया। अंत में उन्होंने जोर देकर कहा कि परिचालन की तिथि 31 जुलाई के स्थान पर 31 दिसम्बर निश्चित की जाए। श्री गुंजाल ने पुरःस्थापित किए जाने की बात का विरोध करते हुए सदन से कहा कि विधेयक का समर्थन न करें। शाम के पांच बज चुके थे और अधिवेशन का वह अंतिम दिन था। प्रेसीडेंट सदन को देर तक बैठने पर विचार जानना चाहते थे। चूंकि