घृणित समर्पण
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इसके लिए विशाल बहुमत नहीं था, उन्होंने सदन की बैठक स्थगित कर दी। इस प्रकार विधेयक असेम्बली के शरदकालीन सत्र तक स्थापित हो गया।
विधेयक पर केन्द्रीय विधानमंडल के शरदकालीन सत्र में 24 अगस्त, 1933 को फिर बहस शुरू हुई। सरकार की ओर से सर हैरी हेग ने स्पष्ट किया कि विधेयक को परिचालित करने के प्रस्ताव के हमारे समर्थन का अर्थ यह कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि सरकार उसके उपबंधों का भी समर्थन करती है। यह तो सही है कि सरकार की दलितों के प्रति सहानुभूति है और उनके सामाजिक आर्थिक विकास के लिए चिंतित है। उन्होंने पिछली जनवरी को जो सरकारी विज्ञप्ति घोषित की थी उसका उल्लेख किया। उस विज्ञप्ति में सरकार का विचार पूरी तौर से स्पष्ट किया गया था। जहां तक मंदिर जाने वाले हिंदुओं के लिए परिचालन की शर्त का प्रश्न था, श्री हेग ने कहा कि यह शर्त पूरी करना व्यावहारिक रूप सये उपयुक्त नहीं होगा। सरकार चाहती थी कि हिंदू समाज के सभी वर्गों द्वारा उस विष्ज्ञय पर बहस हो, इसलिए श्री शर्मा के संशोधन को वे पूर्ण समर्थन देते हैं। जून 1934 तक परिचालित करने के लिए श्री शर्मा का संशोधन स्वीकार कर लिया गया। बाकायदा तुरंत राय ली गई, जो हजारों फुलस्केप कागजों पर दर्ज थी। दूसरे चरण के लिए विधेयक तैयार कर दिया गया कि उस पर विचार करने के लिए एक प्रवर समिति गठित की जाए। श्री रंगा अय्यर ने भी इस प्रकार के प्रस्ताव की सूचना दी। तभी एक अनोखी घटना घटी। भारत सरकार ने असेम्बली भंग करने का फैसला किया और नए चुनाव का आदेश दे दिया। इस घोषणा का परिणाम यह हुआ कि श्री रंगा के विधेयक के संबंध में केंद्रीय विधानमंडल में कांग्रेस सदस्ययों का रुख अचानक बदल गया। सभी सदस्य उस विधेयक के विरोधी हो गए और भविष्य में किसी प्रकार का समर्थन देना अस्वीकार कर दिया। उन्हें चुनावों का भय सताने लगा। श्री रंगा अय्यर की स्थिति बड़ी दयनीय थी। उन्होंने इसका बड़ी तीखी भाषा में विरोध किया, जिसका उद्धरण नीचे दिया गया है। श्री रंगा ने अपना प्रस्ताव पेश करते हुए कहा -
फ्महोदय, मैं मंदिर प्रवेश विधेयक पेश करता हूं, ताकि तथाकथित दलित
वर्गों पर लगे प्रतिबंध हट सकें। श्रीमन् मैं प्रस्ताव करता हूंः
‘हिंदू मंदिरों में प्रवेश के संबंध में तथाकथित दलित वर्गों पर लगे
प्रतिबंध दूर करने वाले विधेयक को एक प्रवर समिति को सौंपा जाए जिसमें
माननीय सर नृपेन्द्र सरकार, माननीय सर हेनरी क्रैक, भाई परमानंद, राय
बहादुर एम.सी. राजा, श्री टी.एम. रामकृष्ण रे्यस्त्री, राय बहादुर बी.एल. पाटिल
और प्रस्तावक सदस्य के रूप में हों।’