घृणित समर्पण
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लिए एक महान कांग्रेसी नेता अपने दामाद देवदास गांधी के साथ हमारे घर धरने पर बैठ गए। उन्होंने बार-बार मुझे दिल्ली बुलाया और कहा कि हम इस वैधानिक प्रस्ताव पर संयुक्त समर्थन की तलाश में हैं। अब शेक्सपियर की भाषा में केवड़े की तरह वही आदमी थूककर चाट गया। दक्षिण के इस सूक्ष्म बुद्धि वाले व्यक्ति का कहना है कि राजनीतिक दलों की विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रश्नों को लेकर भिन्न-भिन्न नीतियां हैं।
फ्किसी एक समय में उन सभी को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जा सकता।य्
फ्मान्यवर, यह कांग्रेसी नेता जनता की भावनाओं का सामना करने से डरता है, जो उसी की भड़काई हुई होती। क्या कांग्रेस के लोग गुलाम हैं?
जो दलित और कमजोर लोगों के लिए कुछ कहने से डरते हैं, वे गुलाम हैं।
फ्मिल्टन के अनुसार ‘कहना और सीधे कहकर मुकर जाना सिद्ध करता है, वह झूठा ही नहीं बल्कि इससे भी बढ़कर कायर है।’ श्री राजगोपालाचारी आम चुनाव से पहले प्रत्येक मंच से, जो भी कहा करते थे, अब उससे मुकरते हैं। यह कहा करते थे -
फ्इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी सामाजिक मुद्दे लेकर चुनाव में गए हैं।य्
फ्यह कहने का अर्थ है कि वे जनता को, उनके पूर्वाग्रहों को बढ़ावा देने के लिए गए हैं। जिन्हें उन्होंने गुमराह किया था परन्तु अब वे स्वंय दलदल में फंस गए हैं। लॉर्ड विलिंगटन ने असेम्बली भंग कर उन्हें दलदल से बचा लिया और संवैधानिक वायसराय होने के नाते संवैधानिकता के मार्ग पर लाकर सुरक्षित कर दिया। इसलिए वे अपने दोषों से बच गए और अब विधानमंडल में अधिक से अधिक संख्या में आने की चालें चल रहे हैं। यदि वे मंदिर प्रवेश विधेयक अथवा अस्पृश्यता के प्रश्न को लेकर चले होते, तो उन्हें शायद बहुत से मतों से हाथ धोना पड़ता, क्योंकि उनका मुख्य मुद्दा वह नहीं था। श्री गांधी द्वारा सार्वजनिक रूप से मेरा विरोध किए जाने के बावजूद मैंने यह कहा था। मैंने उस समय भी यही कहा था जब शंकराचार्य मालाबार में स्थित पालघाट में मेरे भाई के घर पर ठहरे हुए थे। मेरा भाई विधेयक का विरोध करने के लिए प्रतिनिधिमंडल बनाकर वायसराय के पास