4. घृणित समर्पण - Page 146

घृणित समर्पण

131

फ्इसका मतलब यह हुआ कि वे मंदिर-प्रवेश विधेयक के संबंध में जनता की रय नहीं जानना चाहते। वह महाशय, जो हमारे दरवाजों पर गिड़गिड़ा कर कांग्रेस के लिए समर्थन मांगते थे, जिन्होंने मंदिर-प्रवेश विधेयक के समर्थन में हमें आश्वासन दिया था, जिन्होंने कांग्रेस के समर्थन की भीख मांगी थी कि वह मंदिर प्रवेश चाहते हैं, वे आज अस्पृश्यों के हितों के विरुद्ध विश्वासघात नहीं कर रहे हैं, वरन् स्वयं श्री गांधी के सिद्धांतों के साथ भी विश्वासघात कर रहे हैं क्योंकि हमें मालूम है कि कम्युनल एवार्ड में अस्पृश्यों के उत्थान की जो सुविधाएं दी गई थीं, उन्हीं के कारण श्री गांधी ने अनशन किया था जिसको कांग्रेस ने संशय के साथ अस्वीकार किया था और इसीलिए हम जानते हैं कि अस्पृश्यता का प्रश्न, जिसे हल करना है, जिसके लिए महान श्री गांधी सारे देश का भ्रमण करना चाहते थे, आज कांग्रेसी उनके साथ ही विश्वासघात कर रहे हैं। पहले भी इन्होंने काउंसिलों का बाईकाट करने के प्रश्न पर विश्वासघात किया था। वे काउंसिलों में फिर आए और आगे चलकर, उन्हीं के संबंधी श्री राजगोपालाचारी की सहायता से उनके साथ विश्वासघात किया और वही आज कह रहे हैं कि वे जनता का आदेश है कि अस्पृश्यता के प्रश्न और मंदिर प्रवेश विधेयक पर कुछ नहीं करेंगे।

फ्महोदय! मैं पूछता हूं कि राजा बहादुर कृष्णमाचारी और श्रीमान राजगोपालाचारी के बीच कहां अंतर है? राजा बहादुर कृष्णमाचारी सदैव मानते थे कि पहले जनता से आदेश लो, तब आओ और कानून बनाओ। महोदय! वह बुजदिल नहीं हैं। वह अपने आप में बहुत बड़ा सनातनी हिंदू है। वह सभी परिस्थितियों का सामना करने को तैयार हैं। ठीक इसके विपरीत ये लोग, जो सनातनी हिंदुओं को ऊपर से नीचे तक, सारे देश में जकड़कर सूली पर लटका देना चाहते हैं, भूल जाते हैं कि सनातन धर्म स्वयं अपने में पूर्ण सत्य है और वे जैसा व्यवहार करते हैं, सनातनी हिंदू भी उसे ठीक नहीं कहेगा, क्योंकि सनातन धर्म सनातन सत्य है और सत्य के साथ विश्वासघात करना केवल झूठों का ही काम है। ये बहुत से सिद्धांत जिनसे हम अपने राष्ट्रीय लक्ष्य पर पहुंच सकते हैं, उनके साथ विश्वास करके अस्पृश्यों का मामला लेकर अपनी खाल बचाने के लिए हाथ झाड़कर खड़े हो सकते हैं। श्री गांधी को अपवाद मानकर जैसा कि हम इस समय देख रहे हैं कि क्षेत्र के सभी बड़े कांग्रेसी नेताओं ने आगामी चुनाव में प्रमुख संयोजक श्री राजगोपालाचारी के माध्यम से कहा है कि -