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राजनीतिक दान

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बना। इसकी तुलना में हिंदुओं ने हरिजन सेवक संघ के लिए जो चंदा एकत्र किया वह धनराशि नगण्य है।

अस्पृश्यों के कल्याण के लिए संघ जिस ढंग से काम करता है, उससे किसी को मतभेद हो सकता है। संघ अधिकतर जो कार्य करता है, वह ऐसा कार्य है, जिसे किसी भी सुसभ्य सरकार को सरकारी साधनों से करना चाहिए। यह पूछा जा सकता है कि संघ सरकार से इस कार्य को अपने हाथ में लेने के लिए क्यों नहीं कहता और उन योजनाओं पर क्यों नहीं खर्च करता, जिन्हें शीघ्रता से निपटाने की आवश्यकता है?

यद्यपि इससे अस्पृश्यों में संघ के प्रति वैमनस्य की भावनाएं नहीं उठ सकतीं, तब भी यह माना जा सकता है कि वैमनस्य की भावना मौजूद है। इन परिस्थितियों एवं कारणों ख्1, पर एक लेखक ने 14 अक्तूबर, 1944 को इंडियन सोशल रिफार्मर में लिखा था µ

फ्अनुसूचित जातियों का एक प्रतिनिधिमंडल सेवाग्राम में श्री गांधी के पास

यह निवेदन करने गया कि हरिजन सेवक संघ प्रबंधक मंडल में अनुसूचित

जाति के सदस्यों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाए। ऐसी सूचना मिली है कि

श्री गांधी ने उन्हें उत्तर दिया कि संघ हरिजनों की सहायता के लिए है। वह

हरिजन संस्था नहीं है, अतः उनका अनुरोध मान्य नहीं है। गोलमेज सम्मेलन

में श्री गांधी ने हरिजनों के लिए सीट आरक्षण का इस आधार पर विरोध

किया था कि वे हिंदू हैं और उन्हें सामान्य हिंदुओं से अलग न किया जाए।

इसके पश्चात् यर्वदा पैक्ट में उन्होंने सीटों के बंटवारे में हिंदू कोटे से सीटें

देने पर विचार किया। जब इस संबंध में मसौदा तैयार होकर बम्बई की आम

सभा में पुष्टि हेतु लाया गया, तब उस बैठक के अध्यक्ष पंडित मदनमोहन

मालवीय थे, उस सभा में से एक दर्शक ने कहा कि कोई आवश्यकता नहीं

है कि इसके लिए अधिक धन खर्च किया जाए, जैसा कि पंडित जी की राय

है। हिंदू समाज का कलंक मिटाने के लिए धन एकत्र किया जाए इसकी क्या

आवश्यकता है? जितने भी लोग यहां पर उपस्थित हैं, यदि प्रत्येक नर-नारी

निश्चित कर ले (उपस्थित महिलाओं की संख्या काफी थी) कि वे सामान्य

हिंदुओं की भांति हरिजनों को भी अपने घर पर आदर का स्थान देंगे, तो यह

  1. इस लेखक की टिप्पणी का आधार 26 सितम्बर, 1944 को अखबारों में छपा यह समाचार था कि

कुछ अछूत श्री गांधी से मिले और उनसे आग्रह किया कि हरिजन सेवक संघ की कार्यकारी परिषद

में अछूतों के प्रतिनिधियों को नियुक्त किया जाए, परन्तु श्री गांधी ने इनकार कर दिया। समझा जाता है

कि लिखने वाला और कोई नहीं श्री के. नटराजन थे।